क्यों गाँवों को भूलते जा रहे (कविता) - रवींद्र कुमार शर्मा

एक दिन वह गाँव का घर भी छूट जाएगा,
वह शहर का घर भी नहीं बचा पाएगा।
जाना तो पड़ेगा अकेले उस मंज़िल की ओर,
जहाँ से फिर कोई वापस नहीं आएगा।

घर का आँगन मिट्टी से भरा हुआ,
वह कच्ची दीवारें भी मिट्टी में समा जाएँगी।
एक-एक ईंट-पत्थर जोड़कर बनाया था जिन्होंने,
उनकी यादें भी धीरे-धीरे धुँधली नज़र आएँगी।

सब मस्त हैं, सबकी अपनी-अपनी ज़िंदगी है,
बचपन के यार-दोस्त कोई अब नहीं बुलाते।
कहाँ गए वह सुंदर लम्हे, वह अनमोल समय?
नाम लेकर दूर से अब कोई आवाज़ नहीं लगाते।

सुनसान आँगन में लगे पत्थर अब भी करते हैं याद,
एक-दूसरे के पीछे दौड़ते कितना होता था वाद-विवाद!
ऐसा क्या हुआ, वक़्त ने कैसी यह करवट बदली?
हर कोई क्यों चाह रहा गाँव से होना आज़ाद?

शहर की ज़िंदगी क्यों सभी को रास आ रही?
एक-दूसरे से अनजान ऐसी ज़िंदगी क्यों भा रही?
गाँव अब वैसे नहीं रहे, तेज़ी से हो रहा विकास,
फिर भी युवा पीढ़ी क्यों गाँवों को भूलती जा रही?

शहर तो शहर है, कभी किसी का अपना न हुआ,
युवा पीढ़ी को चाहिए—बना लो गाँव में भी एक ठाँव।
कोरोना जैसी महामारी से जो हो गया फिर सामना,
तो फिर याद आएगा अपना वही छोटा-सा गाँव!


— रवींद्र कुमार शर्मा
(घुमारवीं, जिला-बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश)

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