भारतीय मनीषा में गुरु: अज्ञान से चेतना तक की अनवरत यात्रा (शिक्षक दिवस विशेष) - साहित्यिक आलेख

भारतीय संस्कृति में गुरु की अवधारणा केवल एक व्यक्ति या उपाधि तक सीमित नहीं है, अपितु यह एक ऐसी अनवरत प्रक्रिया का नाम है जो साधक को अज्ञान के तिमिर से चेतना के प्रकाश की ओर ले जाती है। उपनिषदों की पावन दृष्टि से प्रस्फुटित यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जैसा कि कहा गया है:
अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
यह स्तुति गुरु को केवल एक सामाजिक शिक्षक नहीं मानती, बल्कि उस सृजन, संवर्धन और संहार का अधिष्ठाता ठहराती है जो मन के भीतर के अंधकार को मिटाकर जीवन में व्यापकता का बोध कराता है। जब हम 'गुरुर्ब्रह्मा' कहते हैं, तो इसका अर्थ है कि गुरु विद्यार्थी के भीतर नई संभावनाओं का सृजन करता है; 'गुरुर्विष्णुः' का अर्थ उन सुसंस्कारों का पोषण है, और 'गुरुर्देवो महेश्वरः' का आशय उन संकीर्णताओं और दुर्गुणों का नाश करना है जो व्यक्ति के विकास में बाधक बनते हैं।
मध्यकालीन भक्ति चेतना में कबीरदास ने इसी सत्य को लौकिक सहजता और सूक्ष्म व्यावहारिक अंतर्दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया:
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
कबीर का यह रूपक शिक्षण के मर्म को उद्घाटित करता है। अनुशासन की कठोरता क्रूरता नहीं, बल्कि भीतर से दिया गया वह अदृश्य संबल है जो शिष्य को टूटने से बचाता है और उसे एक सुघड़ आकार देता है। जिस साधना और आत्म-समर्पण की माँग यह प्रक्रिया करती है, उसी के मूल्यांकन में कबीर कहते हैं—
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥
यहाँ 'शीश देना' अहंकार के विसर्जन का प्रतीक है। जब तक विद्यार्थी या साधक अपनी संकीर्ण 'अहं' की सीमा से बाहर नहीं आता, तब तक अमृत तुल्य ज्ञान का संचरण संभव नहीं होता।
प्राचीन और मध्यकालीन बोध की यह धारा आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है। आधुनिक भारत के दार्शनिक राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था—
"किताबें पढ़ने से केवल जानकारी मिलती है, लेकिन एक अच्छा शिक्षक जीने का सलीका और सोचने की दृष्टि देता है।"
सूचना और तकनीक के इस दौर में तथ्य तो यंत्रों के माध्यम से भी सुलभ हैं, किंतु उन तथ्यों को विवेक में बदलना शिक्षक की उपस्थिति से ही संभव है। जब शिक्षक कक्षा में खड़ा होता है, तो वह केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं कराता, बल्कि दृष्टिकोण का निर्माण करता है। इसी दायित्व को राष्ट्रनिर्माता के रूप में रेखांकित करते हुए डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने स्पष्ट किया—
"शिक्षण एक बहुत ही महान पेशा है जो किसी व्यक्ति के चरित्र, क्षमता और भविष्य को आकार देता है।"
अतः गुरु का स्वरूप युगों के साथ बदलता रहा है—उपनिषदों के ऋषियों से लेकर कबीर की साखियों और आज के विश्वविद्यालयी परिसरों तक—किंतु उसका मूल तत्व यथावत है। वह अज्ञान के विष को विवेक के अमृत में बदलने वाला साधन है। जब एक शिक्षक अपने भीतर कुम्हार का वह आंतरिक संबल और आँखों में भविष्य की वह दृष्टि जगाए रखता है, तभी समाज को केवल सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि संवेदनशील और प्रबुद्ध नागरिक प्राप्त होते हैं। शिक्षक दिवस के अवसर पर, आइए हम उन सभी गुरुओं को नमन करें जो हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने में समर्पित हैं।


- बोधायन पत्रिका 

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