२६ अगस्त विनाश लिख दिया, शिव की पावन भूमि पर,
शीतल, शांत हिमालय टूटा, शाप यह किसका जन-जन पर?
सुखद सुबह में क्रूर काल ने, मृत्यु-तांडव फैलाया,
बच्चे, बूढ़े काल-गाल में, महाप्रलय यह क्यों आया?
माता-पिता, बहन, भाई सब, पल भर में ही समा गए,
भवन, संपदा, गाय, पशु सब, कोई बताए कहाँ गए?
पथरा गईं हज़ारों आँखें, रोम-रोम में पीर घनी,
कई हज़ार अति व्याकुल रोते, नरक-वेदना आन पड़ी।
मासूमों की व्याकुल आहें, गहन वेदना हर मन में,
क्या था प्रभु अपराध हमारा, सब कुछ छीना जो तुमने?
माँ-आँचल के नन्हे शिशु भी, बूँद-बूँद को तरस रहे,
सुख, शांति, समृद्धि वाले, दरिद्र, रंक-से बिलख रहे।
स्वर्ग-सा हिमगिरि नर्क बना क्यों, बेबस आँसू पूछ रहे?
काल-कवलित कई हज़ारों, घायल सारे बिलख रहे।
धीर बँधा दो, पीर हरो जो, देव दयालु कहलाते,
किस त्रुटि का यह महादंड है, क्यों नहीं हमको बतलाते?
कैसे जग विश्वास करेगा, करुणानिधान कहलाते हो?
सुख के दो पल भोग न पाए, उन्हें नर्क पहुँचाते हो?
टूटी सांसें, बिखरा जीवन, सब कुछ लुट गया है इनका,
इतनी शक्ति दे दो इनको, सँवर जाए जीवन फिर सबका।
नहीं जानते कहाँ बसे हो, क्यों विनाश करवाते हो?
बेबस, निरीह, निर्बल, वंचित को, मर्मांतक पीर दिलाते हो?
हम सब साथ खड़े दुखियों के, राहत-संबल देने को,
तन, मन, धन से सेवा करके, फिर नवजीवन देने को।
हर पल सेवा और सृजन के, नित-प्रति कदम बढ़ाएँगे,
हर मन को शांति, राहत दे, फिर नव सुमन खिलाएँगे,
घने अँधेरे हर दिल के हम, नव आलोक भी लाएँगे।
— इंजी. अरुण कुमार जैन
(अमृता हॉस्पिटल, सेक्टर-८८, फरीदाबाद, हरियाणा)