शिक्षक होने का गर्व (कविता) - अभिलाषा सिंह


शिक्षक हूँ यह गर्व सहित
मैं कहती हूँ।

 मेरे कंधे भार उठाते परिवर्तन का
नौनिहाल हैं केंद्र हमारे आवर्तन का
त्याग, समर्पण धैर्य सभी सद्गुण हैं मेरे
खड़ी समस्याएँ बच्चों की मुझको घेरे।

मुस्काती मैं समाधान सब करती हूँ
शिक्षक हूँ यह - - - ।

 भले मशीनें बहुत ज्ञान दे पाएँगी
भावों की नगरी कैसे ले जाएँगी?
बच्चों के मन की गहराई मापेंगी?
वहाँ उतरकर मौन इरादे भाँपेंगी?

सुंदर मन वाले जीवन को गढ़ती हूँ
शिक्षक हूँ यह - - - ।

उँगली हम पर समझे बिना उठाने वालों
शिक्षक की मर्यादा यहाँ गिराने वालों
गुरु शिष्य की परंपरा को भुला रहे हो
तुच्छ सोच से नींव देश की हिला रहे हो

अंतरभेदी शब्दों को भी सहती हूँ,
शिक्षक हूँ यह गर्व सहित मैं कहती हूँ।

- अभिलाषा सिंह 
    शिक्षिका
   पटना, बिहार 

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