एक बार फिर से भारत में आना तुम।
भटक गए हैं लोग, सुपथ पर लाना तुम॥
जरासंध-कंसों का बढ़ता ज़ोर यहाँ,
सभी कुपथ पर, सबके मन में चोर यहाँ।
दुर्योधन-दुःशासन गौरवशाली हैं,
विदुर-युधिष्ठिर के घर बिलकुल खाली हैं।
अनाचार को जड़ से पुनः मिटाना तुम,
भटक गए हैं लोग, सुपथ पर लाना तुम॥
आज गरीबी-भूखमरी का आलम है,
क़दम-क़दम पर पसर गया अब मातम है।
गोकुल में अब गाय न चरती मिलती है,
वृंदावन में कली न मन की खिलती है।
आकर फिर ख़ुशियों के फूल खिलाना तुम,
भटक गए हैं लोग, सुपथ पर लाना तुम॥
चौराहे पर चीर-हरण नित होता है,
धर्मराज नित शीश झुकाकर रोता है।
किंकर्तव्यविमूढ़ आज अर्जुन का मन,
आज महाभारत का कैसा भीषण रण!
पुनः पार्थ को गीता-ज्ञान सिखाना तुम,
भटक गए हैं लोग, सुपथ पर लाना तुम॥
- अर्जुन प्रभात