लीला लीलापुरुषोत्तम के, नटवर किसुनमुरारी के,
करीं आरती निरमल मन से, गोबर्धन गिरधारी के।
जेकरा ओठे रहे बँसुरिया, शंख-चक्र बा हाथन में,
मिलत रहे रस-गगरी जेकरा गोपालन के बातन में,
मिलत रहे सुख छेड़छाड़ में, माखनचोर कहावे में,
टेर सुनत भगतन के धावे, चाहे दिन भा रातन में।
रखले लाज जे द्रुपदसुता के, चीर बढ़ा के सारी के,
करीं आरती निरमल मन से, गोबर्धन गिरधारी के।
जमुना तीरे कदम-डाढ़ पर चढ़िके रास रचावे जे,
बस्तर गोपी लोग के धीरे से लेके लुकवावे जे,
मन से निश्छल, नरम, मोलायम, माखन जइसन कोमल ऊ,
बाकिर दुष्टन आ पापिन के छक्का खूब छोड़ावे जे।
साधु-संत के मिले सुरक्षा, इहे फिकिर बनवारी के,
करीं आरती निरमल मन से, गोबर्धन गिरधारी के।
फल के चिन्ता छोड़िके भइया, करम कर तजिके अभिमान,
अर्जुन के ई पाठ पढ़वलन अउर सिखवलन गीता-ज्ञान,
तहस-नहस करिके कौरव के कइलन चूर-चूर अभिमान,
न्याय दिअवलन कुरुक्षेत्र में, पांडव के ऊ रखलन आन,
भजे 'भगवती' दीनबंधु के, मुरलीधर त्रिपुरारी के,
करीं आरती निरमल मन से, गोबर्धन गिरधारी के।
— भगवती प्रसाद द्विवेदी
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