विकास का पन्ना पुराना हुआ, अब तो गोत्र का बही-खाता खुलेगा,
बिहार का जब चुनाव आएगा, तो विकास नहीं, बस 'जाति' का सिक्का चलेगा!
नेता जी आए तो पूछा नहीं कि 'कितने अस्पताल और स्कूल बनवाए?'
पहला सवाल यही उचका— 'भइया, अपनी बिरादरी के कितने उम्मीदवार आए?'
सड़कें भले ही ग़ायब हों, पर अपनी जाति का नेता चमकेगा,
गड्ढे में भी सीना ठोककर, वोटर अपनी मूँछ ऐंठेगा!
यहाँ मुद्दों पर बात करना तो जैसे टाइम की बर्बादी है,
असली टैलेंट तो इसमें है कि किसकी कितनी आबादी है!
'एम-वाई' समीकरण, फॉरवर्ड-बैकवर्ड और अति-पिछड़ा का जाल रचा,
लोकतंत्र का ढाँचा बैठा, बस कास्ट-कॉम्बिनेशन मस्त बना!
चाचा-भतीजा, दादा-पोता, सब अपनी-अपनी खूँटी बाँधें,
पढ़े-लिखे भी वोट डालते वक़्त, बस अपनी बिरादरी ही साधें।
चाहे मुद्दा हो बेरोज़गारी का, या फिर बाढ़ की तबाही का,
गिनती हमेशा एक ही होगी— 'कौन-सा वोट है किस भाई का?'
नेता जी भी मास्टर हैं, चुनाव आते ही रिश्तेदार बनते हैं,
जीतते ही फिर पाँच साल तक, पटना के बंगले में पलते हैं।
जनता फिर भी ख़ुश रहती है कि 'अरे, अपने ही समाज का बंदा है!'
काम भले कुछ न हुआ हो, पर अपनी जाति का तो झंडा है!
तो भइया! बिहार की इस पावन माटी पर, यह खेल यूँ ही अनवरत चलेगा,
जब तक जात पे वोट पड़ेगा, तब तक विकास का दीया कैसे जलेगा?
- सुशील कुमार
सीतामढ़ी, बिहार