'आखिर उसने जो कहा, कर ही डाला।'
मंच, मंच पर हमने नेताओं का रूप बदलते, पार्टी बदलते और नीति बदलते भी देखा है। लेकिन यह आदमी तो ज़रा भी नहीं बदला। लोग क्या कहेंगे, लोग क्या सोचेंगे—एक पल भी नहीं सोचा। अपने भावों, अपने विचारों को खुला रूप देते, सार्वजनिक करते हुए उन्हें ज़रा भी संकोच नहीं हुआ। ज़रा भी सोचा-विचारा नहीं उसने। डंके की चोट पर, एकदम से खुला-खुला! "आओ बुढ़वा खेलें होली, अपने रंग हज़ार। जीवन एक बार ही मिलता है—बार-बार नहीं। जितना हो सके, हँसी-खुशी से जी लो। यह दुनिया एक मुसाफ़िरख़ाना है, एक सराय है, रैन-बसेरा! जीने के लिए जो साँसें मिली हैं, उन्हें पूरा-पूरा जी लो। यह जीवन भी एक सराय ही है। यहाँ कोई अपना, कोई पराया नहीं। पैसा है तो प्यार है, पावर है तो सब हैं पास-पास! क्योंकि पैसा है तो प्रेम है, पैसा नहीं तो सब तरफ़ वीरानी, उजाड़, मलाल! ऐसे जीवन से अच्छा है, प्रेम के साथ दो पल जी लो—जी उठोगे।"
यह किसी महान संत का विचार या किसी दार्शनिक की कही बातें नहीं थीं, बल्कि अपने ही गाँव के शंभू काका का कथन था।
वह एक बुज़ुर्ग सम्मेलन था। खुला मंच था। हर किसी को अपनी बात रखने की खुली छूट दी गई थी और कहने वाले भी कहने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ रहे थे। किसी ने जीवन की तरक्की में आई रुकावटों का रोना रोया, कोई पेंशन लागू न होने पर रुदन-विलाप करने लगा, तो कोई महँगाई पर भस्म कर देने वाले विचारों से सरकार को श्रद्धांजलि देकर उतर गया। लेकिन शंभू काका एकदम निराले निकले। उनकी एक-एक बात निराली थी। बातों से लगता जैसे कोई युवा किसी वार्षिक सम्मेलन में अपने जीवन के सपनों को सार्वजनिक कर रहा हो।
"सोचता हूँ फिर सांघा बिहा (दूसरी शादी) कर लूँ," कहकर लोगों को चौंकाया था। उन्होंने कहना जारी रखा, "काफ़ी दिन हो गए शादी किए। जब हमारी शादी हुई थी, बाराती पैदल और दूल्हा गरुगाड़ी (बैलगाड़ी) पर होता था। तब तिलक-दहेज नहीं होता था, 'दुल्हन ही दहेज है' कहा जाता था। पहले वरमाला भी नहीं होती थी, दूल्हे के द्वार पर रस्म लगती थी। शादी के पहले लड़का-लड़की को देख नहीं पाता था। अब वरमाला के साथ ही लड़के को लड़की सौंप दी जाती है। 'देखा-देखी कर लो, संग-संग नाच लो, फोटो-शोटो खिंचवा लो'—यह देख मेरा भी जिया ललचा उठा है। और इसी के साथ फिर सांघा करने को मेरा मन मचलने लगा है। पहले बेरोज़गार था, एक साइकिल और एक गाय तिलक-दहेज के रूप में लड़की के साथ भेज दी गई थी। अब रोज़गार में हूँ। नौकरी है, अच्छी-ख़ासी सैलरी है, घर है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है, यार-दोस्तों के बीच अच्छी पकड़ है, किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। बस रात को उल्लू की तरह जागता रहता हूँ। पहली वाली तो बेवफ़ा निकली, लोक छोड़ परलोक में जा बसी। उसकी याद में आँसू बहाता रहता हूँ। मुझे रोता देख एक दिन उसने आकर कहा—'मेरी याद में कब तक आँसू बहाते रहोगे, दूसरी कर लो, तुम्हें तकलीफ़ होती होगी।' मैं मान गया। अब मन फिर बाप बनने को उकसा रहा है। तिलक-दहेज नहीं चाहिए, सिर्फ़ एक जोड़ी कपड़े में लड़की विदा कर दो...!"
वह एक पल को रुके थे। सभा-स्थल में फुसफुसाहट होने लगी थी—
"किस सनकी-पागल को माइक थमा दिया गया है, जो मन में आ रहा है, बके जा रहा है...!"
"कल और आज का फ़र्क बता रहा है...!" कोई बोल उठा।
"हमें तो लग रहा है, यह सभा को संबोधित नहीं, अपनी दूसरी शादी का प्लान बता रहा है...!"
"पर बोल तो अच्छा रहा है...!" उस पर लोग बोलने शुरू कर दिए थे।
पर शंभू काका का रेडियो बंद नहीं हुआ था। विविध भारती की तरह उन्होंने खुद को चालू रखा, "बुज़ुर्गों ने भी फ़रमाया है कि यह दुनिया एक सराय है, एक मुसाफ़िरख़ाना है। जब तक जीवन है, जीते ही जाना है। यही नहीं, लोगों को बीच-बीच में शादी-बिहा करते रहना चाहिए, जैसे पहले के बूढ़े-बुज़ुर्ग किया करते थे और जैसे आज के नेता लोग बीच-बीच में पार्टी बदलते रहते हैं और लड़कियाँ दोस्त! फिर हम पीछे क्यों रहें? आख़िर उम्र ही क्या हुई है मेरी! पचपन का हूँ, पर दिल तो बचपन का है। अच्छी-ख़ासी सैलरी है, और क्या चाहिए आज की लड़कियों को? पैसे वाला हो तो आज की लड़कियाँ बूढ़ा-सूढ़ा, काला-गोरा और ठिगना भी नहीं देखतीं और सीधे हाँ कर झपट लेती हैं—जैसे बाज कबूतरों पर झपटता है...!"
"कर लो! कर लो!" कुछ ने उकसाने वाली आवाज़ लगाई।
"तड़ीपार, नशेड़ी, गंजेड़ी, चार-पाँच लाख तिलक पा रहा है...!" शंभू काका कहते रहे, "माना कि वे कुँवारे हैं, अरे, तो हमें भी कुँवारा समझ लो न, घंटा भी फ़र्क नहीं पड़ेगा। बोलो, कोई मेरा दोबारा बिहा करवा सकता है? कोई दूरद्रष्टा, कोई महानुभाव है? बिहा सिर्फ़ मेरे साथ होगा, हमारे घर-परिवार के साथ नहीं। जीवन भर का साथ मैं दूँगा। हमारे घर-परिवार से उसका कोई लेना-देना नहीं रहेगा। परिवार का किसी तरह का भार उस पर पड़ने नहीं दूँगा। खाना भी उसे बनाना नहीं पड़ेगा, बर्तन भी माँजने नहीं पड़ेंगे। लेकिन लड़की किसी जाति-पाँति की बाध्यता वाली नहीं होनी चाहिए—बस सिर्फ़ लड़की होनी चाहिए। वह फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर और इंस्टाग्राम वग़ैरह में सिर्फ़ चैटिंग करने का काम करेगी, हमेशा ऑनलाइन रहेगी और ऑनलाइन खाना मँगवाकर मुझे खिलाएगी और खुद भी खाएगी। सप्ताह में एक दिन हम किसी पार्क में घूमने जाएँगे, फ़ोटोशूट करेंगे और फिर किसी दिन किसी नदी में नहाते, किसी झरने के नीचे अपनी कोमल देह को सहलाते-नहलाते फ़ोटोशूट करेंगी...! फिर उसे फ़ेसबुक पर अपलोड करेंगी, इंस्टाग्राम में चेपेंगी और हर साल हम शादी की सालगिरह मनाएँगे, जो अभी तक हमने पहली के साथ नहीं मनाई थी...! क्या कहा आपने? पहली शादी के बारे में बताऊँ और बेटा-बेटी के बारे में भी बताऊँ? ठीक है, तो सुनिए...
चालीस साल पहले बिना तिलक-दहेज के मेरी शादी हुई थी। तब मेरी उम्र यही कोई बारह साल की होगी और हाई स्कूल तेलो में आठवीं कक्षा में पढ़ता था। मूँछ-दाढ़ी अभी निकली नहीं थी और हाथ में मोबाइल नहीं, कॉपी-किताबें होती थीं। आज तो पैदा होते ही बच्चों के हाथ में मोबाइल आ जाता है और कितने तो मोबाइल के साथ ही पेट से निकल आते हैं, जैसे महाभारत का कर्ण कवच-कुंडल पहने पैदा हुआ था। हमारे भी तीन बेटे पैदा हुए, जैसे किसी युग में तीन भगवान पैदा हुए थे—ब्रह्मा, विष्णु और महेश! तब से कई युग गुज़र गए, लेकिन अब धरती पर भगवानों ने पैदा होना बंद कर दिया। अब वे सिर्फ़ स्वर्ग और नरक का काम देखते हैं। हालाँकि हमारे तीनों बेटे बड़ी सरलता से पैदा हुए। किसी ने अस्पताल का मुँह नहीं देखा और न आज के बच्चों की तरह किसी अस्पताल का नाम उनके नाम के साथ जुड़ा! पर सभी के साथ कुसराइन (गाँव में बच्चा पैदा कराने वाली महिला) का नाम ज़रूर जुड़ा हुआ था। अपने लालन-पालन में भी उन तीनों ने कोई मुश्किल पैदा नहीं होने दी और तीनों जर्मन शेफर्ड की तरह पले-बढ़े! बड़े हुए तो एक-एक कर हमने तीनों की शादी कर दी। तब भी वे नहीं बदले, तब भी वे तीनों जर्मन शेफर्ड की तरह आज्ञाकारी बने रहे। लेकिन मेरे नहीं—अपनी-अपनी पत्नियों के! तभी से उनकी सोच बदली थी—हमारे प्रति, अपने बाप के प्रति, बाप के जीवन और ज़िंदगी के प्रति।
साल भर पहले की बात है। छह माह पहले पत्नी मर चुकी थी। बाहर कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। मैं अपने कमरे में कंबल ओढ़े गठरी बना बैठा हुआ था। तभी सुबह आँगन में आग के अलाव को घेरे तीनों जर्मन शेफर्ड बेटों के बीच गुफ़्तगू हो रही थी। शुरुआत बड़े ने की। कह रहा था, 'रिटायर होने के पहले अगर बाप किसी कारणवश मर जाता है, तो बाज़ार चौक की वह दस डिसमिल वाली ज़मीन मैं लूँगा। उस पर मैं एक शानदार "शंभू मार्केट" प्लेस बनाऊँगा और सब किराये पर लगा दूँगा। यही मेरा रोज़ी-रोज़गार होगा...।'
'नहीं, नहीं, ऐसा नहीं होगा...।' मंझिले ने एतराज़ जताया, 'उसमें मेरा भी हिस्सा होगा। बाप के मरने के बाद मिलने वाले सारे पैसे हम दोनों बाँट लेंगे...।'
'आप दोनों तो बड़े मतलबी निकले। ज़मीन में दोनों का हिस्सा, रुपये भी दोनों बाँट लेंगे और मैं क्या बाबा का घंटा बजाऊँगा? मैं क्या पेड़ की खोंडर से पैदा हुआ हूँ!' छोटका छटाँक भर उछल पड़ा था।
'अरे छोटे, नाराज़ काहे होते हो। तुम्हारे लिए नौकरी तो हम दोनों छोड़ ही रहे हैं। तुम मज़े से नौकरी करना...।'
'नहीं, नहीं, भले पैसे मत देना, लेकिन मार्केट में दो कमरे मुझे भी चाहिए...!'
'ठीक है, मंज़ूर...।' बड़ा बोला।
'ठीक है...।' मंझिला भी सहमत हुआ।
'तो फिर ठीक है, तब मुझे एतराज़ नहीं।'
तीनों ने मेरा उसी दिन तेरहवीं पार कर दिया।
'आज के श्रवण!' भीड़ से किसी ने कहा।
'तभी मैंने निश्चय कर लिया—जर्मन शेफर्ड बेटों की सोच और उनके हसीन सपनों पर सुतली बम लगाने का...!' शंभू काका कहते चले गए, 'काम पर मैंने अपने और बेटों के प्लान के बारे में अपने कुछ खास दोस्तों को बताया। कुछ ने मज़ाक में लिया और कुछ ने बेहद गंभीरता से।
"गज़ब की कुंठित चाहत, बाप अभी मरा नहीं और घर में जलाने के सामान आ गए...!" एक साथी ने कहा।
"आज कोई अपना नहीं, सबका सपना मनी-मनी!" दूसरा बोला।
"शंभू दा, ज़िंदगी तो वही है, जो अपनी मर्जी से जी जाए। कौन क्या कहता है, क्या सोचता है, कान देने की ज़रूरत नहीं...!" तीसरे ने जीवन का लॉजिक बताया।
उस दिन के बाद से ही मैंने रातों को सोना कम कर दिया और जागना शुरू कर दिया। कहीं ऐसा न हो जिस छत के नीचे की कड़ी से बेटों के लिए कभी झूले लगा दिया करते थे, क्या पता किसी दिन उसी कड़ी से बेटे बकरे की भाँति मुझे टाँग दें...!' शंभू काका की बातों ने एक समाँ-सा बाँध दिया था। कहिए तो कुछ-कुछ सहमा-सा दिया था। जो लोग शुरू में उनकी बातों से उकताकर जाने को उठे थे, पुनः अपनी जगह पर दिल थामकर बैठ गए थे। शाम होनी अभी बाक़ी थी—उनकी भी और उस सभा की भी।
जीवन की ढलान पर शंभू काका के अंदर एक तूफ़ान-सा उठा था। समाज की गोष्ठी-बैठकों में जाते रहते थे। उन्होंने कहना जारी रखा, "बहुत दिनों से मन में एक विचार बार-बार आ रहा था। तीनों बेटे-पतोहू को एक बड़ा-सा दीपावली बंपर गिफ़्ट दूँ। लेकिन वैसा गिफ़्ट अभी तक कहीं मिला नहीं था। उस दिन समाज की मीटिंग से शाम को रामगढ़ से घर लौट रहा था। गोला चौक में दो स्त्री-पुरुष के बग़ल में एक लड़की गाड़ी के इंतज़ार में खड़ी थी। पता चला कि पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य-वृद्धि के विरोध में सवारी गाड़ियाँ दिन भर रोड पर नहीं चली थीं और शाम हो चली थी, पर गाड़ियों का अब भी पता नहीं था। तीनों परेशान दिखे। मैंने गाड़ी रोक दी और बाहर निकल आया। पूछा—'क्या बात है...?'
'हमें बहादुरपुर जाना है और कोई गाड़ी मिल नहीं रही है...।' लड़की ने बताया।
'मैं उधर ही जा रहा हूँ, फुसरो। चाहो तो मेरे साथ आप लोग चल सकते हैं।'
'डेढ़-दो घंटे से खड़े हैं, एक भी गाड़ी नहीं आई...!' स्त्री ने आदमी की ओर देखा।
'और रुकना ठीक नहीं है...!' आदमी का मुँह धीरे से खुला।
'माँ, आओ, इन्हीं के साथ चलते हैं...!' लड़की बोली और गाड़ी के बग़ल में आकर खड़ी हो गई। मैंने गेट खोल दिया। वह आगे मेरे बग़ल की सीट पर आकर बैठ गई। माँ-बाप दोनों पीछे की सीट पर समा गए। मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पहली बार मैंने लड़की का अवलोकन किया। ग़ौर से देखा, अंदर से महसूस किया। मासूम लगी। वह आगे देख रही थी—सूनी माँग! पर आँखों में सपनों की उड़ान बाक़ी!
लड़की विधवा थी और पेट से भी थी। कुदरत का करिश्मा कहिए या जीवन का संयोग, घंटा भर पहले मीटिंग में विधवा-विवाह पर मेरे ज़ोरदार भाषण का लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया था। मैं कह रहा था—'हर विधवा स्त्री को एक और ज़िंदगी जीने का अवसर मिलना चाहिए। एक ही ज़िंदगी में उसका सब कुछ ख़त्म नहीं हो जाता...!' अपनी ही कही बातें याद आ रही थीं मुझे।
'आप क्या करते हैं...?' अचानक से वह पूछ बैठी।
'नौकरी...!'
'घर कहाँ हुआ...?'
'मुंगो गाँव...!'
'पत्नी क्या करती हैं?'
'वह चल बसीं, इस दुनिया में नहीं हैं...!'
वह चुप हो गई। एक बार उसने मुझे देखा और कुछ पल मुँडी गड़ाए बैठी रही। शायद कुछ सोचने लगी थी—मेरे बारे में, अपने बारे में या फिर समय की विडंबना पर।
बहादुरपुर आ गया था। सामने विशाल शिव मंदिर खड़ा था—बूढ़ा बाबा का एक और घर! मैंने गाड़ी रोक दी और बाहर निकल आया। पूर्णिमा का चाँद आसमान पर उग आया था। इक्का-दुक्का लोग आ-जा रहे थे, जैसे शाम को लोग टहलने निकले हों। सबकी अपनी धुन, अपनी चाल!
'बाहर आ जाओ...!' मैंने लड़की से कहा। वह बेधड़क गाड़ी से नीचे उतर आई। आगे बढ़कर मैंने उसका हाथ थाम लिया। वह सहजता के साथ मेरे सामने खड़ी हो गई—निरखने-सी भाव-मुद्रा! ऊपर-नीचे ताकने लगी।
उसकी कोमल हथेलियों को सहलाते हुए मैंने कहा, 'मेरे साथ, हमारे घर चलोगी? मैं भी जीवन में अकेला हूँ, अब तुम भी अकेली हो गई हो। शायद इसीलिए जीवन के मोड़ पर क़िस्मत ने हम दोनों को मिलाया है। उम्र में भले बड़ा हूँ, पर बूढ़ा नहीं हूँ। आख़िरी साँस तक साथ दूँगा। कभी किसी चीज़ की कमी होने नहीं दूँगा...!'
'मैं... मेरे पेट में बच्चा पल रहा है...!' वह हकलाई थी।
'सब कुछ देख-समझकर ही मैंने यह प्रस्ताव रखा है। बच्चा तुम्हारे नयनों का तारा होगा और मैं तुम दोनों का माली—शंभू माली... शंभू नाम है मेरा!'
'मैं फूलमती, फूलमती महतो...!' उसने मेरी आँखों में झाँका, जहाँ उसे एक पूरा जीवन-मंडल विराजमान नज़र आया। तब उसने माँ-बाप की ओर देखा। हमें गाड़ी से उतरे देख वे दोनों भी उतर गए थे और अचंभित भाव-पूर्ण नज़रों से हम दोनों को देख रहे थे...।
'फिर क्या हुआ...?' भीड़ ने पूछा।
'क्या आप लड़की को साथ ले आए...?'
'लड़की के माता-पिता ने क्या कहा...?'
'तभी उसकी माँ आगे बढ़ी थी...!' सवालों के जवाब समेटते हुए शंभू काका ने कहा—'पहले तो उसने बेटी के सिर पर हाथ रखा और मंदिर के अंदर चली गई। लौटी तो उसके हाथ में काग़ज़ से लिपटी सिंदूर की पुड़िया थी। पुड़िया उसने मेरे हाथ पर रख दी और बेटी से कहा—"यह सिंदूर माँग में भर लो बेटी! बूढ़ा बाबा घर का है, सदा जगमगाती रहोगी...!"
"शादी के छह माह बाद ही तुम्हारी क़िस्मत में छेद हो गया। अब उसी क़िस्मत ने तुम्हें एक मौका फिर दिया है। जाओ बेटी, इस फ़रिश्ते के साथ सदा ख़ुश रहना!" बाप ने फूलमती के सिर पर हाथ रख दिया था...!'
'घर में स्वागत हुआ या आफ़त आई...?' किसी ने बीच में फिर पूछ बैठा।
'धमाका हुआ! जर्मन शेफर्ड बेटों के सपनों पर सुतली बम फट गया...!' शंभू काका ने जैसे जीत की ढफ़ली बजाते हुए कहा था, 'बहादुरपुर से छूटे तो हम सीधे बोकारो मॉल में जा घुसे। फूलमती की वेश-भूषा भी तो बदलनी थी। नए परिधानों में वह सचमुच की फूलकुमारी लग रही थी। खुद का नया रूप देख खुद से शर्मा गई और देर तक मुझसे लिपटी रही। रास्ते में हमने एक होटल में खाना खाया। घर पहुँचे तो रात काफ़ी हो चुकी थी और सभी अपने-अपने कमरे में गहरी नींद सो रहे थे। हमने किसी को जगाया नहीं और हमेशा की तरह किसी ने उठकर हमसे पूछा नहीं कि "खाकर आ रहे हो, या खाना भी है...!" हमेशा की तरह हमने अपने पास की चाबी का इस्तेमाल किया। पहले गाड़ी अंदर की, फिर फूलमती को बाहों में लिए अंदर अपने कमरे में समा गए। लगा बहुत बड़ी जंग जीतकर लौटा हूँ। सोए तो दोनों यही दुआ कर रहे थे कि इस रात की फिर सुबह न हो। लेकिन फिर सूरज उगा, फिर सुबह हुई, और ऐसी सुबह हुई कि बहुतों की सालों-साल की नींद उड़ा दी। कौवे छत की मुंडेर से उड़ गए और मैनाओं ने डाल बदलने से मना कर दिया।
सुबह सबसे पहले फूलमती ही उठी। शौचालय से निवृत्त होकर मुझे उठाया। आँगन में जर्मन शेफर्ड पुत्रों को अपनी पत्नियों के संग खड़े पाया। बड़ा पुत्र दहकते अंगारों-सी आँखें किए आगे बढ़ आया—"पापा, यह आपने क्या कहर बरपाया? बुढ़ापे में दूसरी शादी कर लाए...!"
बड़े की शह पाकर मंझिला भी बढ़ आया—
"लोग क्या कहेंगे ज़रा भी न सोचा, खुद को जवान समझा, क्या है यह लोचा...?"
तभी छोटा-सा फुसफुसाया—"खाने को बप्पा को कोई नहीं पूछता था, आज बप्पा ने हम सबके खाने में ज़हर मिलाया...!"
"कल तक बप्पा को कोई पूछ नहीं रहा था, आज बप्पा का किसी का साथ पाना बहुत अखर रहा है। जाओ, तीनों मिलकर बना लो शंभू मार्केट। लगा दो किराये पर, हम चले अपनी राह...!" कहकर साबुन-तौलिया लिए मैं बाथरूम में जा घुसा और फूलमती मुरझाए सूरजमुखी के पौधों को पानी देने लगी...!'
"शाबाश काका...!" भीड़ से कोई बोल उठा।
"शंभू काका की जय हो!"
शंभू काका के जीवन का रंग देखकर भीड़ में सभी "हो, हो, हो...!" करके हँसने लगे।
- श्यामल बिहारी महतो
बोकारो, झारखंड
फ़ोन नं. 6204131994