मैं हिंदी: परित्यक्त भाषा (कविता) - त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय

किससे कहूँ मातृभाषा है,
लगता नहीं, मात्र झाँसा है!

गई जवानी, आया बुढ़ापा,
तीस पर अपना आपाधापी।

कहाँ कोई अब पूछ रहा है,
अपने मन की ठूँस रहा है!

बोली ठिठक-ठिठक ठहरी है,
लगी चोट इतनी गहरी है।

साँसें अटक गई लगती हैं,
भाषा कहाँ यहाँ जगती है!

सब मुझ पर होते हावी हैं,
सबके कर घर की चाबी है।

समझ लिया है मुझे खिलौना,
लगता है पूजा का दोना!

हाय! दुर्दशा झेल रही हूँ,
कहीं आग से खेल रही हूँ।

कोई है जो हृद् को पहचाने,
भूले-भटके आए-जाने?

समय तीव्र है, गति निरंतर,
मुझे पढ़ा जाए अति मंतर।

गणक अगर हो यह समझाए,
क्यों मुझको है दूर लगाए?

मैं अति प्यारी, भोली-भाली,
हूँ सबके घर की रखवाली।

मुझसे प्रखर जीव ही होगा,
मुझमें योगी योग का योगा।

मैं अति सुंदर ग्रीवा-हार हूँ,
मैं जल की अति तीव्र धार हूँ।

मुझको हृदय लगाकर देखो,
मुझमें ज़रा सर लगाकर टेको!

सब कुछ छोड़ तुझे धर लूँगी,
अपनी व्यथा खोल कहूँगी।

कैसे त्यक्त हुई अपनों से,
डरकर रही सबके भौंहों से!


— त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय 
             दिल्ली

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