अटल ढूँढती हूँ (गीत) - डॉ. प्रीति सुमन


मिली भारती रात सपने में आकर,
कहने लगीं अपने आँसू छुपाकर—
बिता जो स्वर्णिम, मैं कल ढूँढती हूँ,
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है, मैं मेरा अटल ढूँढती हूँ।

नहीं कोई सीमा, न कोई परिधि,
पवन-पुत्र सा लाँघता था समस्या।
अटल-सा अटल पुत्र पाने की ख़ातिर,
न पूछो कि मैंने की कितनी तपस्या!
किया आँखें अपनी सजल ढूँढती हूँ,
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है, मैं मेरा अटल ढूँढती हूँ।
बड़ा दूरदर्शी, बड़ा शौर्यशाली,
बड़ी ओज वाली हैं उसकी कथाएँ।
नहीं बाँध पाई जिसे कोई बाला,
नहीं तोड़ पाईं जिसे कुप्रथाएँ।
वही आत्मशक्ति प्रबल ढूँढती हूँ,
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है, मैं मेरा अटल ढूँढती हूँ।

कभी पोखरण में, कभी कारगिल में,
लिखे थे कि उसने विजय-गीत अपने।
किया देश के नाम जीवन को अर्पित,
समर्पित किए मुझको सब स्वप्न अपने।
जो मुझमें खिला था कमल, ढूँढती हूँ,
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है, मैं मेरा अटल ढूँढती हूँ।

बिता जो स्वर्णिम, मैं कल ढूँढती हूँ,
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है, मैं मेरा अटल ढूँढती हूँ।

- डॉ. प्रीति सुमन 
सीतामढ़ी, बिहार 

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