तू साँस में बसा है (ग़ज़ल) - सूरज तिवारी

क्या है गुनाह यार, बताया न जाएगा,
तू साँस में बसा है, भुलाया न जाएगा।

तेरा कसूर कुछ नहीं, फिर भी यह सोचकर,
तुझसे किया था वादा, बताया न जाएगा।

हम पिंजरे को खोल परिंदे उड़ा रहे,
बंधक किसी को भी अब बनाया न जाएगा।

खाई कसम थी संग जो जीने की, ऐ ख़ुदा!
तस्वीर को गले भी लगाया न जाएगा।

मेरे रक़ीब! तू ही बता तुझसे क्या कहूँ,
अब बोझ ज़िंदगी का उठाया न जाएगा।


— सूरज तिवारी
(भदोही, उत्तर प्रदेश)

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