हासिल अमर कुर्बानियों का, पर्व यह गणतंत्र का,
शहादतों की निशानियों का, पर्व यह गणतंत्र का।
राष्ट्र की बलिवेदी पर सर्वस्व न्योछावर कर दिया,
काटकर निज शीश माँ-चरणों में जाकर धर दिया।
अमर-अक्षुण्ण बलिदानियों का, पर्व यह गणतंत्र का,
शहादतों की निशानियों का, पर्व यह गणतंत्र का।
अपनी ख़ुशबू अधखिले ही जो लुटाकर चल दिए,
आज़ादी के परवाने जो ख़ुद को मिटाकर चल दिए।
उनकी अमर कहानियों का, पर्व यह गणतंत्र का,
शहादतों की निशानियों का, पर्व यह गणतंत्र का।
दिन है यह संविधान के ससम्मान पुण्य-स्मरण का,
संविधान-पथ पर चलने का, निज दायित्व के वरण का।
भारत-भू के सेनानियों का, पर्व यह गणतंत्र का,
शहादतों की निशानियों का, पर्व यह गणतंत्र का।
चूमकर फाँसी के फंदे जो गीत वतन के गा गए,
मुक्त फिज़ाएँ दे वतन को, ख़ुद को ख़ुशी से मिटा गए।
अजर-अमर उन जवानियों का, पर्व यह गणतंत्र का,
शहादतों की निशानियों का, पर्व यह गणतंत्र का।
परतंत्रता से मुक्ति का, स्वतंत्रता की बयार का,
सत्य-निष्ठा, भाईचारे, प्रेम, सौहार्द और प्यार का।
देशप्रेमी स्वाभिमानियों का, पर्व यह गणतंत्र का,
शहादतों की निशानियों का, पर्व यह गणतंत्र का।
- अशोक दर्द
डलहौजी चंबा, हिमाचल प्रदेश