हम गर्वित पर्व मनाते हैं।
धर्म सनातन प्रकृति-पोषित,
साँपों को दूध पिलाते हैं।
दया भाव से भरा अतुलनीय,
नाग पंचमी पर्व पुराना।
पौराणिक जाँचा-परखा यह,
ध्येय रहा जीव-जंतु बचाना।
सदा रहे पूर्वज हमारे,
ज्ञान-ध्यान में, नहि विद्वेषी।
पर्व बनाए हैं उन्होंने,
प्रकृति-जीव-जंतु हितैषी।
फैलाया भ्रम-मिथ्या जिसने,
भारत बारे में, धिक्कारो।
देश सपेरों, इंद्रजाल का,
बात कभी न इसे स्वीकारो।
जलमग्न सकल भूमि वर्षा में,
भू भीतर तक आप्लावित हो।
तल बिल बांबी कीट जीव जगत,
आते ऊपर भय-भावित हो।
- ममता तिवारी ' मृदुला '
छत्तीसगढ़