योग से परम पद (कविता) - त्रिपुरारी कुमार पांडेय


क्रिया-योग होता सरल, करते जो निष्पाप,
चक्र भेदने की क्रिया, होती अपने आप।

मूलाधार है जड़ जहाँ पर, कुंडलिनी सोई है,
चक्रों पर अधिकार, समझ लो ब्रह्म-शक्ति वह है।

धीरे-धीरे पर मगर, क्रिया करो प्रारंभ,
मन बिल्कुल ही सरल हो, नहीं ज़रा हो दंभ।

स्वाधिष्ठान, अनाहत होकर, कुंडलिनी हो आगे,
ज्ञान और विज्ञान प्राप्त कर सकता वह बिन त्यागे।

समभावों से यहीं समागम, दर्शन पाता नर है,
पकड़ो पाँव, हृदय में भर लो, वही यहाँ ईश्वर है।

लो विशुद्धि आ गया, यहाँ पर धरती व आकाश,
तब नियंत्रण तुम्हारा होता, बाहर-भीतर श्वास।

होकर तन का मोह किंतु, तन से वह ऊपर,
नाममात्र का समझो, रहता वह है भू पर।

अक्षय-अमृत-रूप प्राप्त कर, पाकर आज्ञा,
तू ही तू दिखता है, तू भी केवल संज्ञा।

वह सहस्रदल से सुशोभित कमल की तरह,
है कैसा वह चक्र बताऊँ, कह न सकता।

जो कहने को आता है धरती पर मानव,
सुनो, यहाँ कह करके फिर रह न सकता।


— त्रिपुरारी कुमार पांडेय
(विक्रमशिला कॉलोनी, भागलपुर)

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