ज़िंदगी का फ़ैसला फिर जो भी हो!
साथ मेरे है ख़ुदा फिर जो भी हो!
घूँट तो पीने ही होंगे उम्र भर,
आँसुओं का ज़ायक़ा फिर जो भी हो!
मौत ही मंज़िल हो जिसकी आख़िरी,
दर्द की उसके दवा फिर जो भी हो!
है ग़नीमत तेरे लब तक आई तो,
वह दुआ या बद्दुआ फिर जो भी हो!
जंग से भागे हुए इक शख़्स की,
बुज़दिली पर तब्सरा फिर जो भी हो!
- बलजीत सिंह
सुपुत्र श्री जोगिंदर सिंह
103/19, पुरानी कचहरी कॉलोनी
नज़दीक इम्प्रैशन इंस्टिट्यूट,
हाँसी (हिसार)
पिन-125033
राज्य हरियाणा
साहित्यिक उपलब्धियाँ
शिक्षा : स्नातक
सम्प्रति : संगीत अध्यापक
उपलब्धियाँ : विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ, राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित