कृष्णा और गोविंद बहुत अच्छे मित्र थे। गाँव की गुल्ली-डंडा से लेकर शहर के हॉस्टल में रतजगे तक। इनकी दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं कि ये कलयुग के माधव और पार्थ हैं। दोनों पढ़ाई पूरी करने के बाद हस्तशिल्प की एक दुकान कर लिए। कृष्णा डिज़ाइन सँभालता और गोविंद, ट्रांसपोर्ट और हिसाब। फिर तो दोनों के जीवन और दोस्ती की गाड़ी और सरपट दौड़ने लगी। जब जीवन ज़्यादा बेहतर और सुखमय होने लगता है, तो पतन पीछा करना प्रारंभ कर देता है, किसी न किसी रूप में। इनकी दुकान का प्रकाश न जाने कितने लोगों की आँखों में खटकने लगा, जिसमें से एक इनका दोस्त मोहन भी था।
एक दिन मोहन कुर्सी लेने दुकान आया। तीनों अपने कॉलेज के दिनों की यादों को ताज़ा कर वैसे ही गर्म चाय और समोसे के साथ एक रसमलाई के बंदर-बाँट पर खूब हँसे। एक कुर्सी लेकर जाते हुए मोहन ने धीरे से कहा, "ए कृष्णा! यह गोविंद हिसाब-किताब तो अच्छे से करता है न?" कृष्णा गोविंद की तरफ़ देखा, वह असहज लग रहा था। कृष्णा एक धौंस जमाते हुए मोहन के साथ निकलते हुए बोला, "अरे साले पागल है क्या! कुछ भी बोलता है।"
उस दिन से गोविंद सबकुछ भूल जाता लेकिन कृष्णा को हिसाब देना नहीं भूलता, जबकि कृष्णा हर बार कहता, "अरे यार! मुझे हिसाब क्यों देता है? मुझे अच्छा नहीं लगता।"
एक दिन सामान लाते हुए गोविंद से बाकी बचा पैसा शायद रखते वक्त गिर गया। मुश्किल यह थी कि न सामान की रसीद ले पाया था, न बचा पैसा गिन पाया था। क्या कहे कृष्णा से, समझ नहीं पा रहा था। तभी कृष्णा ने कहा, "सामान सब छोड़, रख लेंगे। पैसे दे, चलते हैं खाने मोहन के साथ।" गोविंद अचानक घबराकर बोला, "पैसे 'गिर' गए।" मोहन कृष्णा की तरफ़ देखकर मुस्कुराया और कान के पास मुँह सटाकर झट से निकल गया। कृष्णा बोला, "छोड़ चल, घर खाने चलते हैं।" गोविंद कृष्णा की तरफ़ शंकित नज़रों से देखते हुए पूछा, "क्या कहा उसने?" कृष्णा बोला, "कुछ नहीं।"
गोविंद की आँखों में अविश्वास की रेखा घर बनाने लगी और धीरे-धीरे यह अविश्वास पार्टनरशिप पर आया, हफ्ते भर में अपने-अपने दुकान पर। उस दुकान का प्रकाश तो बुझा ही, साथ में बहुत कुछ अंधकारमय हो गया—दोस्ती, रिश्ते, विश्वास और सबसे ज़्यादा एक बेटी का मायका।
- किरण परशुराम चतुर्वेदी
भभुआ, बिहार