फ़र्क (लघुकथा) - प्रो. संजय रॉय 'रंगकर्मी-चित्रकार'

लाचार बूढ़े कुत्ते के पैर कुचलकर भाग रही कार को कुत्तों के झुंड ने बहुत दूर तक भौंकते हुए खदेड़ा, पर अफ़सोस कि वे उसे घेरने में कामयाब न हो सके। आखिरकार झुंड भागने की दिशा की ओर ज़ोर-ज़ोर से भौंकते हुए अपने गुस्से का इज़हार कर रहा था। वहीं कुछ एक, घायल बुज़ुर्ग के पास उनके पैरों की स्थिति से वाकिफ़ हो रहे थे। यह सब देखकर पास खड़े गधे ने कुत्तों से कहा,
"तुम लोग व्यर्थ का शोर मचा रहे हो! अब कौन किसकी परवाह करता है भला... यहाँ तो इंसान, इंसान को कुचलकर उफ़ तक नहीं करता। तुम सब तो कुत्ते ही ठहरे!"
इस पर कुत्तों के झुंड में से एक युवा कुत्ते ने कहा,
"हाँ भाई, सही कह रहे हो... मगर हम कुत्तों का वजूद तो वफ़ादारी लिए भौंकने और ललकारने की बुनियाद पर ही टिका हुआ है। इंसानों की भांति ऐसे संगीन मामलों पर भी अगर हम लोग चुप बैठेंगे, तो क्या फ़र्क रह जाएगा हममें और उनमें?"
यह सुनते ही गधे की बोलती बंद हो गई।


- प्रो. संजय रॉय 'रंगकर्मी-चित्रकार'
शिवनारायण रोड, कच्ची घाट,
पटना सिटी-800 008 (बिहार)

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