शालिनी खुशमिज़ाज और चंचल लड़की थी, जबकि सुनीता सुशील और शर्मीली थी। दोनों पुष्पेंद्र पांडे की कक्षा में थीं। कक्षा में दोनों की नज़रें पांडे पर ही रहतीं। दोनों चाहती थीं कि वह उनसे खुलकर बातें करे। लेकिन पांडे अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ज़्यादा ध्यान देता था; उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य था। फिर भी धीरे-धीरे उसका झुकाव सुनीता की तरफ बढ़ने लगा। लेकिन अगर कोई शालिनी को छेड़ता, तो पांडे उसे छोड़ता नहीं था; उसके लिए लड़ाई-झगड़े पर उतर आता। इस वजह से शालिनी सोचने लगी कि वह उसे चाहता है, जबकि उसका झुकाव तो सुनीता की तरफ था।
सुनीता के सम्मोहक रूप और सुडौल बदन पर कसा हुआ पहनावा अच्छे-अच्छों का मन बहका देता। उसकी सुराहीदार गर्दन और हिरनी जैसी आँखें थीं। जब वह बात करती और उसके होंठ हिलते, तो ऐसा लगता था मानो दो जाम एक साथ टकरा रहे हों। उसकी आँखों में एक ऐसा आकर्षण था जो पांडे को अपनी तरफ खींच रहा था।
इंटरमीडिएट का परिणाम आ चुका था। पांडे उच्च शिक्षा के लिए डी.ए.वी. कॉलेज, सीवान चला गया और शालिनी मेडिकल की पढ़ाई के लिए पटना चली गई, जबकि सुनीता बोकारो चली गई, जहाँ उसका दाखिला विनोबा भावे विश्वविद्यालय में हो गया।
समय बीतता गया और समय के साथ-साथ पांडे, शालिनी और सुनीता तीनों अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ गए। सुनीता और पांडे का संपर्क बना रहा। पत्र-व्यवहार का सिलसिला जारी था। दोनों स्नातक के अंतिम वर्ष में थे। पांडे के लिए एक से बढ़कर एक शादी के रिश्ते आने लगे, लेकिन उसकी नज़र तो सुनीता पर ही थी। सुनीता ने भी अपनी सहमति जता दी थी, लेकिन उसके माता-पिता जाति-पात के बंधन से ऊपर उठने को तैयार न थे और भागकर शादी करना पांडे को स्वीकार न था।
सुनीता अपने माता-पिता की इच्छाओं के विरुद्ध नहीं जाना चाहती थी, लेकिन उसने अपनी माँ से दबी आवाज़ में कह दिया कि "माँ, मैं पांडे से ही शादी करना चाहती हूँ, अन्यथा अभी शादी नहीं करूँगी।"
पांडे का भी वही हाल था। दोनों ने शादी टालने के लिए एक सुंदर बहाना ढूँढ लिया। अपने-अपने माता-पिता से बोले कि अभी पढ़ना है, आगे बढ़ना है और अपने पैरों पर खड़ा होना है। इस तरह समय बीतता रहा और समय-समय पर दोनों की मुलाकातें भी होती रहीं।
जून का महीना था। मानसूनी बादल हवा के झोंकों के साथ उड़ रहे थे। देखते ही देखते घनघोर बारिश शुरू हो गई। बारिश बहुत तेज़ हो रही थी, रह-रहकर बिजली चमक रही थी और बादलों की गड़गड़ाहट हो रही थी। चारों तरफ काली घटा छाई हुई थी; ऐसा लगता था मानो दिन में ही शाम हो गई हो। यह मानसून की पहली बारिश थी। भीषण चिलचिलाती गर्मी से सबको राहत मिल रही थी। कुछ लोग पानी में नहा रहे थे, तो उधर बच्चे भी पानी में छप-छप कर रहे थे। गंगा के उस पार की गर्म रेतीली ज़मीन ने बारिश की बूंदों का स्वागत किया और उसे अपने भीतर समा लिया।
पांडे महात्मा गांधी सेतु से गुज़रता हुआ गायघाट बस स्टैंड पर उतरा और ऑटो-रिक्शा में बैठ गया। बारिश अभी रुकी नहीं थी, फिर भी पांडे जैसे-तैसे पी.एम.सी.एच. पहुँच गया, जहाँ उसकी चाची भर्ती थीं। पांडे पानी में पूरी तरह भीग चुका था। अचानक उसके कदम महिला वार्ड की तरफ बढ़ने लगे, जहाँ उसकी मुलाकात शालिनी से हो गई। वह पटना मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. कर रही थी और अंतिम वर्ष में थी। वह ड्यूटी पर थी और पांडे से मिलकर बहुत खुश हुई। पांडे बोला:
“चलो शालिनी, पहले अपनी चाची से मिल लें, उनका हाल-चाल जानने आया हूँ।”
फिर दोनों ने जाकर चाची का हाल-चाल पूछा। पांडे ने सूखे कपड़े पहने और फिर शालिनी के साथ कैंटीन चला गया, जहाँ दोनों ने दिल खोलकर एक-दूसरे से बात की। बातों-बातों में शालिनी ने सुनीता का ज़िक्र छेड़ दिया, “बताओ पांडे, आजकल सुनीता क्या कर रही है?”
पांडे बोल पड़ा, “अरे वह तो बोकारो में रह रही है। बी.ए. की परीक्षा दे चुकी है और बी.एड. में दाखिले की तैयारी कर रही है।”
शालिनी ज़रा दबे स्वर में बोली, “तुम्हारा क्या विचार है शादी के बारे में?”
पांडे ने खामोशी से सिर झुका लिया। शालिनी ने फिर टोका, “क्या हुआ पांडे, बात नहीं बनी क्या? तुम्हारी नज़र में तो हमेशा सुनीता ही रहती थी। मेरे लिए दिल के किसी कोने में कोई जगह है भी या नहीं?” शालिनी भावनाओं के बहाव में बहती चली जा रही थी।
पांडे ने सिर उठाकर शालिनी की आँखों में आँखें डालकर कहा, “शालिनी, ऐसी बात नहीं है। तुम्हारे लिए भी दिल में जगह है, लेकिन मैंने मन ही मन सुनीता को अपना दिल दे रखा है। उसे ही जीवनसंगिनी बनाना चाहता हूँ, मगर…”
“मगर क्या?” शालिनी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से पांडे की तरफ देखा।
पांडे शालिनी से कहते हुए बोला, “सुनीता के माता-पिता को यह रिश्ता स्वीकार नहीं है…”
शालिनी बोल पड़ी, “आख़िर ऐसी कौन-सी बात है?”
पांडे ने दबी हुई आवाज़ में कहा, “क्या कहूँ, सुनीता के माता-पिता ब्राह्मण कुल में शादी नहीं करना चाहते… और मेरे परिवार वाले भी इस रिश्ते को अपनाने से मना कर रहे हैं। मैं असमंजस के झूले में झूल रहा हूँ…”
शालिनी बोली, “तो पांडे, फिर अब क्या करोगे?”
पांडे ने धीमी आवाज़ में उत्तर दिया, “इंतज़ार! मैं इंतज़ार करूँगा, जब तक वह मेरी नहीं हो जाती…”
समय बीतता गया। समय के साथ सुनीता इंटर कॉलेज में प्रवक्ता (लेक्चरर) बन गई और पांडे हाई स्कूल में शारीरिक शिक्षक (फ़िज़िकल टीचर) के पद पर नियुक्त हो गया। पांडे के लिए एक से बढ़कर एक शादी के प्रस्ताव आने लगे, लेकिन वह तैयार नहीं था। आखिरकार पांडे ने शादी का संदेश सुनीता के घर भिजवाया, लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिला था।
नवंबर का महीना था। पांडे अपने एक संबंधी से मिलने हाजीपुर गया था। सड़क से गुज़रते हुए उसकी नज़र डॉ. शालिनी के क्लिनिक पर जाकर ठहर गई। उसके कदम अचानक उस तरफ बढ़ने लगे।
शालिनी उससे मिलकर बहुत खुश हुई और उसने अपनी शादी के बारे में बताते हुए कहा, “मेरे पति भी डॉक्टर हैं।” शालिनी ने पांडे की आँखों में आँखें डालकर यह बात कही।
फिर शालिनी ने पांडे से पूछा, “अरे पांडे! तुम्हारी शादी का क्या हुआ?”
पांडे की नज़रें झुक गईं। फिर भी हिम्मत करके शालिनी की तरफ देखते हुए बोला, “मेरी किस्मत में तो बस 'इंतज़ार' है। मैं अभी तक इंतज़ार कर रहा हूँ।”
यह कहते हुए उसकी निगाहें फिर से झुक गईं और वह भारी कदमों से आगे की ओर बढ़ गया।
- बैतुल्लाह अंसारी
बिहार