बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों को घटा किसने कहा था
मग़रूर निगाहों को नशा किसने कहा था
आशिक था, दीवाना था या शायर था वो कोई,
पहली दफ़ा उल्फ़त को ख़ुदा किसने कहा था
मुद्दत हुई, बदली नहीं हाथों की लकीरें,
बदलेगी किसी रोज़ हवा किसने कहा था
पछता रहे हो जानकर उल्फ़त की हक़ीक़त,
करने को यहाँ तुमसे वफ़ा किसने कहा था
मज़हब यही कहता है अगर, प्यार किए जा,
फिर हाथ में हथियार उठा किसने कहा था
-रवि किशन कुमार
पता- कंकड़बाग , पटना
लेखन विधाएँ: ग़ज़ल
प्रोफेशन- मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रबंधक पद पर कार्यरत।
प्रसारण और प्रकाशन:
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ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन से ग़ज़लों का प्रसारण।