मैडम(लघुकथा) - सेवा सदन प्रसाद

पुस्तक खोलते ही एक कागज़ का टुकड़ा गिर पड़ा, जिस पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं। न जाने किसके लिए लिखा गया था, क्योंकि न ही कोई संबोधन था और न ही लिखने वाले का नाम। पर लिखावट जानी-पहचानी लगी—अपनी बंगालिन मैडम की। किसी कवि की मात्र चार पंक्तियाँ थीं:  
"चोखे-चोखे कोथा बोलो मुखे किछु बोलो ना,
मन निये खेला कोरो, ऐ कि तुमार छलना।"
  
पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं, पर मैं आश्चर्य में पड़ गया। इस पुस्तक में इसे किसने रखा? इन पंक्तियों के पीछे कहीं रखने वाले की कोई मनोभावना तो नहीं छिपी है? और फिर मैडम के सिवा किसी को पता भी नहीं कि मैं बांग्ला स्वयं... नहीं, अच्छा बोल लेता हूँ और थोड़ा पढ़ भी लेता हूँ। कहीं मैडम... नहीं! ऐसा सोचना भी पाप है। क्योंकि लिखने वाले ने कवि की पंक्तियों के साथ अपनी भावनाओं का ज़बरदस्त तालमेल बिठाया है। मैंने झट उसका हिन्दी अनुवाद कर डाला:  
"आँखों-आँखों से कहते हो सब कुछ, ज़ुबाँ से तो कुछ भी नहीं।
दिल लेके मेरा क्यों खेल रहे, कैसा यह छल? कुछ समझे नहीं?"
यह मैडम नहीं, बल्कि किसी और की शरारत लगी। मैडम की शालीनता, गंभीरता एवं मधुर स्वभाव में कभी भी कोई ग़लत संकेत नहीं देखा। एक पढ़ी-लिखी भद्र महिला, प्राइमरी स्कूल की हेड मिस्ट्रेस, उम्र में भी मुझसे दस साल बड़ी। फिर ऐसी भावना पैदा होने का सवाल ही नहीं उठता।  
मैडम के लिए मेरे दिल में भरपूर श्रद्धा एवं सम्मान है। हम दोनों घंटों कमरे में बैठकर साहित्य एवं राजनीति पर बहस करते। समाज में फैले भ्रष्टाचार के निदान हेतु हल ढूँढ़ते। आर्थिकाभाव के कारण परिवार की टूटती कड़ियों पर अफ़सोस ज़ाहिर करते। और अंत में यह फ़ैसला करते कि अपनी लेखनी एवं शिक्षा का उपयोग मात्र मानव के नैतिक मूल्यों की सुरक्षा हेतु ही करेंगे।  
मैडम बड़ी ही जीवट की महिला हैं। शालीनता की देवी हैं। संघर्ष करना कोई उनसे सीखे। इस महानगरी में अपने स्वजनों से दूर रहकर बच्चों के भविष्य को सँवार रही हैं। असमय हुई पिता की मौत ने उनके सिर पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी डाल दी थी। विधवा माँ की देखभाल, छोटे भाई की पढ़ाई, दो बहनों का भविष्य—तभी से उन्होंने गंभीरता एवं शालीनता की चादर ओढ़ ली। जवानी के दिनों में फूलों की सेज पर चलने के बजाय काँटों की राह पर चल पड़ीं। अपने सारे अरमानों का गला घोंट दिया, मात्र अपने परिवार की खुशी एवं सुरक्षा के लिए। और एक दिन टीचर से 'हेड मिस्ट्रेस' बनकर मुंबई आ गईं।  
मैडम से बहुत कुछ सीखने को मिलता। वह प्रेरणा की प्रतीक लगती थीं। जी चाहता कि हमेशा उनकी बातें सुनता रहूँ और जीने के लिए सबक लेता रहूँ। मन में उन्होंने एक सम्माननीय जगह बना ली थी। उनके अस्तित्व के साये तले मेरा अस्तित्व भी गौरव महसूस करने लगता। अपनी मेहनत एवं लगन की वजह से ही मैडम ने दोनों बहनों की शादी कराकर छोटे भाई समीर को उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेजा था। माँ भी तब निश्चिंत होकर आँखें मूंद सकी थीं।  
मैडम बस अकेली ही रहती थीं। चाहकर भी नौकरानी नहीं रखती थीं, ताकि काम-काज में स्वयं व्यस्त रहें और अकेलेपन का अहसास न हो। यदा-कदा छोटी-मोटी ज़रूरतों के लिए मैं अपनी सेवाएँ अर्पित कर देता। मैडम की आँखों में सदा स्नेह का छलकता सागर नज़र आया।  
भला मैडम का ऐसा गरिमामय अस्तित्व और यह भावुकता भरी चार पंक्तियाँ! सब कुछ गड्डमड्ड सा लगता। हो सकता है ट्यूशन पढ़ने वाली किसी लड़की की शरारत हो। लेकिन मैडम से मैं इतना डरता था कि कभी किसी लड़की की ओर आँख उठाकर देखने की जुर्रत नहीं की। हाँ, पिछले सप्ताह से थोड़ा भय कम हुआ है। अगर यह कहूँ कि उनके समक्ष ज़रा खुल पाया हूँ, तो ज़्यादा उचित होगा।  
दरअसल उस दिन मैं अपने मित्र की 'बर्थ-डे' पार्टी अटेंड करने जा रहा था। सोचा मैडम को भी साथ ले लूँ। जब उनके कमरे में गया तो वह कुछ परेशान-सी दिखीं। वह बिस्तर पर अधलेटी, सिरदर्द से बेचैन थीं। लंदन से टेलीग्राम आया था: "समीर ने शादी कर ली है।"  
शादी! वह भी अपनी मर्जी से, मैडम की अनुपस्थिति में! बस यही हादसा था। काफी समझाने के बावजूद भी मैडम अपने आप को सामान्य नहीं कर पा रही थीं। सोचा—सिर दबा दूँ तो शायद दर्द कुछ कम हो जाए। तब मैं एक स्नेहाकांक्षी की तरह उनका सिर दबाने लगा। मैडम का पूरा बदन काँप-सा गया। शायद पहली बार किसी पुरुष का स्पर्श पाकर! फिर थोड़ी देर के बाद वह मेरी गोद में सिर रखकर सो गईं। मैं लीनता से चादर ओढ़ाकर वापस लौट पड़ा था।  
फिर कई दिनों तक मैं मैडम से मिलने नहीं गया। सोचा, माहौल कुछ नॉर्मल हो जाए तो जाऊँगा। इस बीच मैडम स्वयं मुझसे मिलने आईं और यह पुस्तक छोड़कर गईं। फिर पुस्तक के अंदर लिखा यह पत्र... नहीं, नहीं, यह ज़रूर किसी लड़की की ही शरारत है।  
काफी हिम्मत करके मैं मैडम के पास गया। मैडम काफी खुश नज़र आईं। चेहरे पर न कोई शिकन, न कोई अपराध बोध। तब मुझे यकीन हो गया कि मैडम इन सबसे बिल्कुल अनभिज्ञ हैं।  
मैडम मुझे देखते ही और ज़्यादा खुश हो गईं और बोलीं, "चोलो, आजके जूहू जाबो?"  
मैं तब एक आज्ञाकारी बालक की तरह मैडम के साथ जूहू गया। हम समुद्र किनारे बैठ गए। मैडम अपलक समुद्र की उठती-गिरती लहरों को देख रही थीं। फिर ढलते सूरज की लालिमा की ओर इशारा करके बोलीं, "वासु, यह देखो मेरी जिंदगी भी इसी ढलते सूरज की तरह है।" (मैडम जब बहुत भावुक हो जातीं, तभी मुझे नाम से बुलाती थीं।)  
मैंने प्रत्युत्तर में कहा, "मैडम, यह तो हर इंसान की जिंदगी की सच्चाई है।"  
"नहीं, मेरी जिंदगी की शाम जल्द ही अस्त होने वाली है। मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूँ। सोची थी समीर की शादी धूमधाम से करूंगी, पर शायद उसे भी मेरे संघर्ष की परवाह नहीं।"  
वाकई में मैडम की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह भावविभोर होकर मेरे काँधे पर सिर रखकर सुबकने लगीं। न चाहते हुए भी मेरा हाथ मैडम के सिर को सहलाने लगा। थोड़ी देर के लिए हम दोनों अपने आप में ही खोए रहे। अचानक करीब ही कुछ लोगों के व्यंग्य एवं खिलखिलाहट ने हम दोनों को सचेत किया। फिर हम दोनों ठीक से बैठ गए।  
मैडम में इस बदलाव की वजह मैं समझ नहीं पा रहा था। अब तो यकीन होने लगा—"यह पत्र मैडम ने ही लिखा है।" इतने लंबे वर्षों तक संघर्ष करके जो सम्मान एवं अनुभव पाया है, उसे ऐसी ओछी हरकतों पर क्यों लुटा देना चाहती हैं? यह दिमाग का दिवालियापन है या एक औरत की दबी हुई भूख?  
खैर! मैं सब कुछ समझते हुए भी अनजान बना रहा और मैडम को ढांढस बँधाता रहा। काफी हिम्मत करके कहा, "मैडम, समीर की कुछ मजबूरी रही होगी, वरना आपकी इजाज़त के बिना शादी कैसे कर लेता?"  
मैडम तब लगभग चीखते हुए बोलीं, "सारी दुनिया की मजबूरियों को मैंने समझा, पर आज तक किसी ने मेरी मजबूरी, मेरी परेशानियों और मेरी इच्छाओं को समझने का प्रयास क्यों नहीं किया? मेरी जिंदगी तो एक एटीएम मशीन की तरह बनकर रह गई है कि बस सबकी जरूरतें पूरी करते जाओ।"  
मैं बिल्कुल निरुत्तर हो गया।  
खैर! जैसे-तैसे मैडम को सामान्य करके घर तक लाया और उन्हें बिस्तर पर लिटाकर जाने लगा, तभी मैडम ने मेरा हाथ पकड़ लिया। थोड़ी देर हम दोनों खामोश रहे। फिर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और बहुत ही रुमानी अंदाज में बोलीं—"गुड नाइट।"  
मैं अपने कमरे में आकर निढाल हो गया। सोचा, चंद दिन मैडम को अकेला ही छोड़ दूँ, जब थोड़ी सामान्य हो जाएँगी तब मिलूँगा।  
एक लंबे अरसे के बाद मुझे मैडम की याद आई। मैडम ने भी कभी याद नहीं किया। तब मैं चल पड़ा उनसे मिलने। घर पहुँचकर देखा तो दरवाज़े पर ताला लगा था। पड़ोसी से पूछने पर पता चला कि मैडम तो कोलकाता चली गई हैं। मैं यह सुनकर अवाक रह गया।  
तभी पड़ोसी ने कुछ पुस्तकें दीं, जो मैडम मेरे लिए छोड़ गई थीं। मैं सारी पुस्तकें लेकर वापस घर लौटा।  
पुस्तकों को शेल्फ़ पर रखते वक्त एक लिफ़ाफ़ा गिर पड़ा। मैंने झट से लिफ़ाफ़ा उठाया। लिफ़ाफ़े में एक पत्र था। पत्र खोला और पढ़ने लगा:  
प्रिय वासु,
मैं वापस कोलकाता जा रही हूँ। मैंने अपना त्यागपत्र दे दिया है... अब वहीं क्लासेज चलाऊँगी। संघर्ष करते-करते थक गई हूँ और अपनी ज़रूरतों का मुझे कभी अहसास ही नहीं रहा। मेरे अंदर की औरत थोड़ा बहकने लगी थी, पर तुमने मुझे संभाला। मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। मैं तुम्हें समीर के रूप में पाना चाहती हूँ... लंदन वाले का इंतज़ार नहीं, पर तुम्हारा आजीवन इंतज़ार रहेगा।
तुम्हारी मैडम दीदी
  
आदर से मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े और अपनी सहमति प्रदान करने के लिए मैं कागज़-कलम लेकर बैठ गया।  

- सेवा सदन प्रसाद
 मुम्बई,  महाराष्ट्र
लेखन विधा: सामाजिक, संवेदनशील एवं मानवीय रिश्तों पर आधारित लघु कथाएँ और संस्मरण।  
मुख्य विषय-वस्तु: इनकी रचनाओं में मध्यमवर्गीय जीवन का संघर्ष, पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ, स्त्री-मन की सूक्ष्म भावनाएँ, सामाजिक विषमताएँ और विपरीत परिस्थितियों में भी नैतिकता एवं मूल्यों को बनाए रखने का संदेश मिलता है।  

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