पापा जब भी डाँट लगाते,
दादा जी झट गले लगाते।
'छोटा है यह' कहकर हँसते,
अपने पीछे मुझे छिपाते।
दादी का बटुआ है भारी,
भरी रहतीं चॉकलेटें सारी।
एक माँगूँ तो दो मिलता है,
दादी का यह प्यार दिखता है।
दिनभर घर में दौड़ लगाता,
दादा-दादी को फुसलाता।
पहनकर चश्मा दादा बनता,
मम्मी को भी खूब हँसाता।
रात को दादी पास सुलातीं,
परियों की वह कथा सुनातीं।
रखकर सिर जब गोदी में सोता,
मीठे सपनों में खो जाता।
घर का नन्हा, घर का राजा,
सबके लिए हूँ मैं बाजा।
हँसता-गाता दिनभर रहता,
सबके मन में खुशियाँ भरता।
- रमेश श्रीवास्तव
जी/2, रंजीत विला अपार्टमेंट
मौर्या पथ, खाजपुरा
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