छटपटाहट(ललित निबंध) - संजय पवार

कहने के लिए कितना अच्छा है कि मेरे बच्चे विदेश में नौकरी करते हैं। आज देश के किसी भी राज्य के चाहे किसान परिवार से हों या नौकरीपेशा परिवार से, अपने बच्चों को ऊँची शिक्षा देकर विदेश में नौकरी के लिए भेजना चाहते हैं। बच्चे भी भारत में रहकर अच्छी डिग्रियाँ प्राप्त कर विदेशों की नौकरियाँ ढूँढ़ते हैं। विदेशों में भी भारतीय छात्रों की मेहनत और योग्यता का स्वागत किया जा रहा है। यह चित्र अच्छा ज़रूर लगता है। हमारे युवा अपनी योग्यता के बल पर विदेश की धरती को हर क्षेत्र में बल दिए जा रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया के कोने-कोने में हमारे युवा अपनी सेवाएँ उपलब्ध कराकर चार चाँद लगा रहे हैं।
देश के कुछ युवा विदेश में रहकर ही भारत में रह रहे अपने परिवार की देखभाल भी कर रहे हैं। माता-पिता, भाई-बहन को उनसे मोबाइल या लैपटॉप पर वीडियो द्वारा बात करके अच्छा लगता है। हाल-चाल पूछा जाता है। "आप अस्पताल क्यों नहीं गए?"—यह प्यार भरी डाँट बच्चे वहीं से जब भरते हैं, तब माँ-बाप का मन भर आता है, गला रुँध जाता है। "बैंक खाते में पैसा मिल गया या नहीं?" पूछते हैं। "मैं जल्द आपसे मिलने भारत आ रहा हूँ, बस मेरी छुट्टी मंज़ूर हो जाए"—बच्चे की यह सारी बातें सबको गद्गद् कर देती हैं। देर-सबेर बातचीत होती है, लेकिन बात ख़त्म होते ही फिर ख़ालीपन भर जाता है दोनों ओर। विदेश की नौकरी तो है, लेकिन ढलती उम्र में माँ-बाप से बहुत दूर रहना बहुत बड़ी मजबूरी भी है। यह मजबूरी खलती दोनों ओर है, मगर किया क्या जा सकता है।
विदेश में रह रहे कुछ विवाहित युवा पति-पत्नी दोनों नौकरी करने वाले हैं। कुछ युवाओं की पत्नियाँ वहीं विदेशी भी हैं। सबकी अलग-अलग समस्या है। माता-पिता के लिए उनका बच्चा विदेश में नौकरी करता है, यह भले ही गौरव की बात हो, लेकिन मन उनका रोता है, कौन देख पाता है! विदेश में रहने वालों को भारतीय परिजनों की यादें सताती हैं।
विदेश में नौकरी अच्छी तो है। अच्छी तनख़्वाह, अच्छा रहन-सहन, गाड़ियाँ, मौज-मस्ती, मान-सम्मान है। सब कुछ है, नहीं है तो भारतीयता और अपने परिजन। यह तो चित्र का एक हिस्सा हुआ। चित्र का दूसरा हिस्सा देशीय स्तर पर थोड़ा-बहुत अलग-अलग भी होता है, जो दिखता नहीं, लेकिन वहाँ रहते हैं उनको ही पता है। विदेश की धरती पर सब कुछ सामान्य कभी नहीं होता। उनके नियमों, नीतियों और मानसिकता के अनुकूल अपने-आपको ढालना पड़ता है। शुरू में होने वाली मुश्किलें धीरे-धीरे सामान्य हो जाती हैं, तब स्वदेशी मानसिकता सही-ग़लत भी लगने लगती है। एक बात तो यह ध्यान में रखनी होगी कि विदेश की धरती पर नौकरी में पैसा बहुत मिलता होगा, परंतु भारत से कई गुना ज़्यादा महँगाई होती है। वहाँ की जीवन-पद्धति अलग है, इसलिए ख़र्चे बढ़ते हैं। एक और बात है कि कोई भी देश ज़्यादा पैसा इसलिए नहीं देता कि आप भारतीय बैंकों में अपना पैसा जमा करते रहो। पैसा बहुत है, लेकिन वहाँ की जीवन-पद्धति के अनुसार ख़र्चा भी बहुत ज़्यादा होता है।
भारतीय जो विदेश में किसी भी वजह से रहते हों, उनकी परेशानी यह है कि उनसे ज़्यादा अपेक्षाएँ रखी जाती हैं। उसी वक़्त उनकी अपनी भी मजबूरियाँ हैं, उनके बारे में नहीं सोचा जाता। वे चाहे नौकरी करते हों या कोई उद्योग ही करते हों, उन्हें वहाँ के नीति-नियमों का पालन करना होता है। उनके मन में अपने परिजनों के प्रति एक डर बना हुआ होता है कि न जाने देर-सबेर किसी अप्रिय घटना का फ़ोन न आ जाए। अगर ऐसा संदेश आएगा, तो क्या आसानी से अपने वतन निकल पाएँगें? विदेश से निकलने से पहले छुट्टी का मंज़ूर होना ज़रूरी है, तभी वे अपने मुख्यालय से बाहर जा पाएँगे। हवाई टिकट का इंतज़ाम तो हो भी जाएगा, लेकिन कंपनी से लंबी छुट्टी आसानी से नहीं मिलती।
कुछ दिन पहले एक ख़बर सुनी थी कि भारत में रहने वाले पिता जी के देहांत पर इकलौता बेटा अपने घर नहीं जा पाया। वजह थी कि अमेरिका की कंपनी से उसे तुरंत छुट्टी नहीं मिली थी। छुट्टी मिली कुछ दिन बाद की। वह समय पर नहीं जा पाया। बेटा अपनी मजबूरी पर बहुत रोया था। कुछ दिन माँ के साथ बिताकर उसे वापस लौटना पड़ा था। एक क़िस्सा तो यह भी सुना था कि माँ के देहांत पर विदेश में रहने वाले दोनों बेटे वीडियो कॉन्फ़्रेंस द्वारा अंतिम संस्कार में उपस्थित रहे। तत्काल छुट्टी न मिलने के कारण दोनों माता के अंतिम संस्कार में पहुँच नहीं पाए। ज़रा सोचिए उन बेचारों की क्या अवस्था होगी! अच्छी-बुरी घटनाओं में वे शामिल नहीं हो सकते। उनकी वेदना उन्हें ही पता होगी। विदेश की नौकरी चकाचौंध भरी तो है, लेकिन अपने वतन, अपने लोगों से सुदूर होने की छटपटाहट वे ही जानते हैं।


— संजय पवार
(पुणे, महाराष्ट्र)

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका