सरहद पर तुम्हारा भाई 🇮🇳 (कविता) - डौली कुमारी

अबकी राखी पर आने में,
है थोड़ी कठिनाई।
सरहद पर डटकर खड़ा है,
बहन तुम्हारा भाई!

देश से अपना रिश्ता है,
हर रिश्ते से ऊपर।
एक लक्ष्य बस विजय हमारा,
चाहे मिले मौत को छूकर!

मैं लौटूँ या न लौटूँ,
चाहे लौटे न मेरी कलाई।
सरहद पर डटकर खड़ा है,
बहन तुम्हारा भाई!

शायद आऊँ ओढ़ तिरंगा,
तू आँखें नम नहीं करना।
सबकी किस्मत में कहाँ शहादत,
तुम मेरा ग़म नहीं करना।

मरकर भी तेरे साथ रहूँगा,
बन तेरी परछाई।
सरहद पर डटकर खड़ा है,
बहन तुम्हारा भाई!

तू देखे जो ख़्वाब सुहाने,
वो ख़्वाब कभी न टूटें।
पकड़े जो तेरा हाथ बहन,
कभी उसका साथ न छूटे।

शायद सुन न पाऊँ मैं,
तेरी शादी की शहनाई।
सरहद पर डटकर खड़ा है,
बहन तुम्हारा भाई!

अबकी राखी पर आने में,
है थोड़ी कठिनाई।
सरहद पर डटकर खड़ा है,
बहन तुम्हारा भाई!


- डौली कुमारी
दरभंगा, बिहार

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका