अलबत्ता जितने करीब हम आते हैं,
कुदरती उतने ही दूर हो जाते हैं।
कारण समझाता हूँ, मन को ध्यान लगा,
आँख मूँदकर देख, कहाँ हम पाते हैं!
यह माया है, ढोंग रची मायापति ने,
सब उनकी माया ही में बह जाते हैं।
थोड़े-बहुत बचे-खुचे जो रहते हैं,
बहुत बाद वे ही तो देखा घिघियाते हैं।
रचना बहुत मार्मिक है, शाश्वत भी है,
इसमें विष है, किंतु वहाँ शहद भी है।
जब हम होकर निर्भीक गले लग जाते हैं,
मायापति फिर नया रूप दिखलाते हैं।
प्रचुर मात्रा में रस को घोल दिया,
बड़ी भूल की, सत्य दिखा
कर बोल दिया।
यह इतना आसान नहीं कि मन धर लें,
जो मेरे अंदर था, पूजा खोल दिया।
तुम भी वाजिब में इतने कम थोड़े हो,
बनावटी मुँह दिखा-दिखाकर मोड़े हो।
तुझमें भी असीम शक्ति बहती रहती,
समय देखकर ही कुछ बात यहाँ कहती।
- त्रिपुरारी कुमार पांडेय
विक्रमशिला कॉलोनी, तिलकामांझी,
भागलपुर, बिहार
रचनाएँ (पुस्तकीय कृतियाँ): रहस्य की खोज, गीता: एक कविता, कैकयी-राम संवाद
सम्मान: अखिल भारतीय साहित्य कवि सम्मेलन में पुरस्कृत एवं प्रशस्ति-पत्र द्वारा सम्मानित।