यह रक्षाबंधन है! (कविता) - उदय शंकर चौधरी 'नादान'

मधुपर्व सुमंगल, प्रीति-प्रणय,
देतीं बहनें वरदान अभय।
कच्चे धागों की डोर नहीं,
यह बंधन है, कमजोर नहीं।
यह डोर स्नेह का बंधन है, यह रक्षाबंधन है!

निष्कलुष रीति-रिवाज़ है यह,
निःशब्द राग-अनुराग है यह।
परम पुनीत, समग्र-श्रेष्ठ,
प्रकृति-पर्व में निपुण-ज्येष्ठ।
धारण कर अभिनंदन है, यह रक्षाबंधन है!

जीवन भर यह साथ रहे,
आशीष-भरा यह हाथ रहे।
नहीं माँगती धरा-गगन,
अस्मिता नारी की है अर्पण।
विनय भ्रात का वंदन है, यह रक्षाबंधन है!

रखनी है मेरी लाज तुझे,
है भाई! तुम पर नाज़ मुझे।
हों तेरे सारे पुण्य-कर्म,
हों अभय तुम्हारे सत्कर्म।
तप-त्याग-भाव-समर्पण है, यह रक्षाबंधन है!


- उदय शंकर चौधरी 'नादान'
कोलहंटा पटोरी, दरभंगा

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