राखी भाई-बहन के प्यार का अनूठा है बंधन,
जो बड़ी धूमधाम से हर वर्ष मनाया जाता।
बहुत दूर भी रहते हों भाई-बहन,
मगर धागे से बंधा प्यार एक संदेश लाता।।
बचपन में खेलते-खेलते किसी
बात पर हो जाती थी तकरार,
इक-दूजे के बिना नहीं रह पाते थे,
आपस में था बहुत प्यार।
बचपन के रक्षाबंधन के होते थे अजब नज़ारे,
उस दिन भाई ही लगते हैं सब बहनों को प्यारे।
कितने भी पिटे हों या पीटे हों बचपन में,
गले लगती हैं बहनें भूलकर शिकवे सारे।
झूठ बोलकर जब बहन पापा से पिटवाती थी,
जब रोते थे तो चुप करवाने खुद ही आ जाती थी।
लेकिन राखी वाले दिन बड़े प्यार से बुलाती थी,
कुमकुम, अक्षत और फूल का टीका माथे पर लगाती थी।
कलाई पर राखी बाँधकर हमको मिठाई खिलाती थी,
शादी के बाद अब कभी-कभी ही आ पाती।
याद बहुत करती है अपने भाई को,
हर वर्ष रक्षाबंधन पर राखी ज़रूर भिजवाती।
राखी को देखकर वह बचपन याद आता,
जब भाई रक्षाबंधन पर बहन को बुलाता।
भाई और बहन का आज का नहीं,
यह तो जन्मों-जन्मों का है नाता।
ज़माने के साथ बदल गया इसको मनाने का ढंग,
अब तो राखियों के आ गए हैं बाज़ार में कई रंग।
जहाँ राखी पहले होती थी कच्चा धागा हाथ से बनाया,
अब तो राखियों की कीमतें देखकर रह जाते सब दंग।
अब राखियाँ कई रंगों की, कई डिज़ाइनों में हैं मिलती,
कोई दस, कोई बीस की, कोई हज़ारों की है बिकती।
राखी की कीमत से क्या लेना, खुश रहे सारा संसार,
धागों का यह बंधन टूटे न, अटल रहे भाई-बहन का प्यार।
- रविन्द्र कुमार शर्मा
(घूमरवीं, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश)