जीवन! जो तुम हो (कविता) - डॉ. राम प्रमोद मिश्र

विगत स्मृति और आगत कल,
जीवन! तुम छल ही तो हो।
अधरों पर आलाप हैं किंतु,
अंतरमन से विलाप ही तो हो।

'आनंद, उत्सव, उल्लास हूँ मैं',
परिचय यही था तुमने दिया।
पर तुम पर्याय संताप, शोक के,
'अंत' का उन्माद ही तो हो।

अस्थियों के एक आकार को हमने,
देह कहा! श्वासों से श्रृंगार किया।
शेष हुईं साँसें, देह शव हो गया,
दाह और राख ही तो हो।

संकेत तुम्हारे बड़े गूढ़ थे,
समझ न पाए, हम ही मूढ़ थे।
संकेतों पर तेरे बस चलते रहे,
'पंचतत्व' में विलयन ही तो हो।

जितना समझे, उतना ही उलझे,
स्याह स्वप्न सा यह मानव जीवन।
भग्न और अशेष आशाएँ हमारी,
पीड़ा का प्रस्तर-पथ ही तो हो।

जितने क्षण तुम्हें जीते रहे,
कैसे-कैसे विष हम पीते रहे।
पल-दो-पल का कोलाहल तुम,
और फिर नेपथ्य ही तो हो।

कहने को तुम्हें जीवन कहते रहे,
मोह, शोक की छाया में पलते रहे।
व्याधि, जीर्णता और मरण के,
व्यथित आरंभ का अंत ही तो हो।


- डॉ. राम प्रमोद मिश्र
      लखनऊ, उत्तर प्रदेश 

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