रात धीरे-धीरे अपनी काली चादर फैलाती जा रही थी। आकाश में चाँद बादलों की ओट से कभी झाँकता, कभी छिप जाता। मोहल्ले की सड़कें लगभग सूनी हो चुकी थीं। इक्का-दुक्का गाड़ियों की आवाज़ दूर कहीं से सुनाई दे जाती और फिर सब कुछ शांत हो जाता।
उर्मिला देवी अपने छोटे-से आँगन में बिछी चारपाई पर बैठी थीं। उनकी आँखें बार-बार घर के मुख्य दरवाज़े की ओर उठ जातीं। घड़ी की सुइयाँ जैसे उन्हें चिढ़ा रही थीं—टिक-टिक, टिक-टिक। हर गुज़रता पल उन्हें और बेचैन कर रहा था।
बेटा और बहू अभी तक होटल से खाना खाकर लौटे नहीं थे। जाते समय बेटे ने यूँ ही कहा था—
“माँ, आज हम लोग बाहर ही खाना खा लेंगे।”
उस वाक्य में न आग्रह था, न अपनापन, बस एक साधारण-सा सूचना देने वाला भाव। उर्मिला देवी ने तब कुछ नहीं कहा था, बस हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया था। मगर उनके मन में एक उम्मीद थी—शायद वे उनके लिए भी कुछ पैकेट लेते आएँगे।
इसी आशा में उन्होंने रात का खाना नहीं बनाया। चूल्हा आज भी जैसे उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। बर्तन वैसे ही रखे थे, जैसे शाम को रखे गए थे। रसोई में हल्की-सी ठंडक थी और एक अजीब-सी खामोशी।
उर्मिला देवी उठकर फिर दरवाज़े तक जातीं, बाहर झाँकतीं और निराश होकर लौट आतीं। उनकी आँखों में इंतज़ार की थकान साफ़ झलक रही थी।
“शायद अभी आते होंगे…”
वह अपने आप से बुदबुदाईं।
इतने में दूर से कार की आवाज़ सुनाई दी। उर्मिला देवी के चेहरे पर जैसे अचानक उजाला भर गया। वह तेज़ी से उठीं और लगभग दौड़ती हुई दरवाज़े तक पहुँच गईं।
कार आकर घर के सामने रुकी। पहले बेटा उतरा, फिर बहू।
उर्मिला देवी की नज़र तुरंत उनके हाथों पर गई। दोनों के हाथ खाली थे।
उनका चेहरा एक पल को जैसे मुरझा गया। मगर अगले ही क्षण उन्होंने अपने मन को समझाया—
“शायद पैकेट कार में ही रह गए होंगे।”
एक हल्की-सी उम्मीद के सहारे उन्होंने बहू से सहज भाव से पूछ लिया—
“बहू, गाड़ी में कुछ छूटा तो नहीं?”
बहू ने बिना उनकी तरफ़ देखे सिर हिलाकर ‘नहीं’ कहा और सीधे अपने कमरे की ओर चली गई।
बेटा भी बिना कुछ बोले मोबाइल देखते हुए अंदर चला गया।
दरवाज़े पर खड़ी उर्मिला देवी कुछ क्षण वहीं ठिठकी रह गईं। जैसे किसी ने उनके भीतर की सारी रोशनी एक ही पल में बुझा दी हो।उनकी आँखों में एक अजीब-सी नमी तैर आई। पेट में भूख की हल्की-सी आग अभी बाकी थी, लेकिन बेटे-बहू की इस निष्ठुरता ने उस आग को भी शांत कर दिया।
धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वह आँगन में वापस आकर चारपाई पर बैठ गईं। रात अब और भी गहरी हो चुकी थी। घर के भीतर से बेटे-बहू की हल्की-हल्की हँसी और बातचीत की आवाज़ आ रही थी।
उर्मिला देवी की आँखें अनायास भर आईं।
तभी उनकी नज़र कमरे के कोने में सोए अपने पाँच साल के पोते बिट्टू पर पड़ी। बिट्टू आज बहुत खुश था, क्योंकि वह भी अपने मम्मी-पापा के साथ होटल गया था। जाते समय वह कितने उत्साह से कह रहा था—
“दादी, आज मैं बहुत सारे व्यंजन खाऊँगा!”
अब वह गहरी नींद में सो रहा था। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी, मानो सपने में भी वह वही स्वादिष्ट व्यंजन देख रहा हो।
उर्मिला देवी धीरे-धीरे उसके पास गईं और उसके सिर पर हाथ फेरने लगीं।
उनके मन में बिट्टू की बातें गूँजने लगीं—
“दादी, मैंने पनीर खाया… नूडल्स भी… फिर आइसक्रीम… और गुलाब जामुन भी…”
बिट्टू की मासूम आवाज़ याद आते ही उर्मिला देवी की आँखों से आँसू की एक लंबी धारा बह निकली।
वह मन ही मन उन सभी व्यंजनों की गिनती करने लगीं—
पनीर, नूडल्स, पुलाव, आइसक्रीम, गुलाब जामुन…
हर व्यंजन के साथ जैसे उनकी आँखों से एक और आँसू गिर जाता।
उन्हें याद आया—जब उनका बेटा छोटा था, तब वह उसके लिए कितने प्रेम से तरह-तरह के पकवान बनाती थीं। कभी कचौड़ी, कभी हलवा, कभी खीर। बेटा खुशी से उछल पड़ता था और कहता—
“माँ, तुम्हारे हाथ का खाना दुनिया में सबसे अच्छा है।”
वह याद करते-करते मुस्कुरा भी दीं, मगर वह मुस्कान पलभर में ही भीग गई।
समय सचमुच कितना बदल जाता है। वही बेटा, जो कभी उनकी उँगली पकड़कर चलता था, आज उनके अस्तित्व को ही जैसे भूल गया था।
उर्मिला देवी ने आकाश की ओर देखा। चाँद अब पूरी तरह बादलों में छिप चुका था।
उन्होंने धीरे से अपने आँसू पोंछे और बुदबुदाईं—
“शायद यही समय का नियम है…”
फिर वह चुपचाप उठीं, रसोई में गईं और एक गिलास पानी पीकर वापस आ गईं।
भूख अब भी थी, मगर उससे कहीं ज़्यादा भारी था उनका मन।
आँगन में खड़ी नीम की छाया जैसे उनके दर्द की साक्षी बन गई थी।
उर्मिला देवी ने एक बार फिर बिट्टू को देखा। उसके चेहरे की मासूम मुस्कान उन्हें थोड़ी-सी सांत्वना दे गई।
उन्होंने धीरे से उसके माथे को चूम लिया।
फिर आकाश की ओर देखते हुए अपने आँसुओं की अनगिनत लड़ियाँ पोंछती रहीं—
और मन ही मन उन सभी व्यंजनों की गिनती करती रहीं, जिन्हें उनके पोते ने खाया था।
रात की खामोशी में बस एक बूढ़े दिल की पीड़ा थी—
और आँसुओं की वह अनगिनत धारा, जिसे कोई देख नहीं रहा था।
— रंजनालता, समस्तीपुर (बिहार)
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