गुरु पूर्णिमा: अज्ञान के अंधकार से परम ज्ञान की ओर - साहित्यिक आलेख

भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्म का स्वरूप और ईश्वर तक पहुँचने का सर्वोत्तम मार्ग माना गया है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा का यह पावन पर्व अपने उन्हीं पथ-प्रदर्शकों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का अनुपम अवसर है।
शास्त्रों में गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहा गया है:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थात, गुरु ही सृष्टि के सृजक ब्रह्मा हैं, वही पालनकर्ता विष्णु और संहारक महेश हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे पूज्य गुरुदेव के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम है।
जीवन के अंधकारमयी पथ पर जब विवेक डगमगाने लगता है, तब गुरु अपने ज्ञानरूपी दीपक से अंतःकरण को आलोकित करते हैं। इस गूढ़ रहस्य को उजागर करता यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

जिस प्रकार अज्ञानरूपी अंधकार से अंधी हुई आँखों में गुरु ज्ञानरूपी अंजन की सलाकाई लगाकर हमारे चक्षु खोलते हैं, वही वास्तव में सच्चे गुरु हैं। गुरु की कृपा से ही जीव को सत्य और असत्य का बोध होता है तथा साधक मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है:

गुरुर्बिनु भवनिधि तरइ न कोई। 
जौं बिरंचि शंकर सम होई॥

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष॥

अर्थात, बिना गुरु के कोई भी इस संसार सागर को पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा या शिव के समान ही क्यों न हो। गुरु के बिना न तो ज्ञान की उत्पत्ति होती है, न सत्य का साक्षात्कार और न ही जीवन के दोषों से मुक्ति मिलती है।
संसार के सभी तीर्थ और साधनाएँ एक तरफ और गुरुदेव के चरणकमलों की धूलि एक तरफ है। गुरु की सन्निधि प्राप्त होना ही सबसे बड़ा सौभाग्य है:

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥

ध्यान का मूल गुरु की दिव्य मूर्ति है, पूजन का मूल उनके श्रीचरण हैं, सभी मंत्रों का मूल गुरु के मुख से निकले वचन हैं और मुक्ति (मोक्ष) का मूल केवल और केवल गुरु की कृपा है।

गुरु पूर्णिमा का यह पावन पर्व हमें स्मरण कराता है कि हम अपने जीवन में गुरु के दिखाए सन्मार्ग पर चलें, उनके विचारों को आत्मसात करें और ज्ञान की इस अविरल धारा को अविरत बहने दें। इस शुभ अवसर पर समस्त गुरुजनों के चरणों में हमारा सादर नमन।

- बोधायन पत्रिका 

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