अगर कर्म है सत्य सुहावन, तो किस्मत तक दासी है।
हो व्यवहार समानांतर तो, आँगन मथुरा-काशी है।
जो भी पहुँचा सिंधु-गर्भ में, लेकर आया मणि-मोती।
बैठा रहा किनारे पर जो, जला न पाया मन-ज्योति।
टूट गए भावों के मनके, उर-तल तक बनवासी है।
हो व्यवहार समानांतर तो, आँगन मथुरा-काशी है।।
सफल हुआ है वही, परिश्रम को जिसने सहचर माना।
सिर्फ़ लक्ष्य की प्राप्ति हेतु ही, जिसने अनुपम प्रण ठाना।
वही नेह का गंगासागर, वही पूर्ण संन्यासी है।
हो व्यवहार समानांतर तो, आँगन मथुरा-काशी है।।
जीवन है बस चार दिनों का, करो प्यार की बरसातें।
मन से मन को करो विवाहित, करो समर्पित सौगातें।
करो तृप्त उस नेह-निलय को, जिसकी चाहत प्यासी है।
हो व्यवहार समानांतर तो, आँगन मथुरा-काशी है।।
— सुमंगला सुमन
मुंबई , महाराष्ट्र
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गीत