बचाना चाहते हो तुम जो मेहनत के निवालों को ​— सुभाष पाठक 'ज़िया'


बचाना चाहते हो तुम जो मेहनत के निवालों को,

तो फिर अपनी ज़ुबाँ पर लाओ मत जलते सवालों को।

अंधेरों के गिनाए जा रहे हैं फ़ायदे इतने,

बुरा कहने लगे हैं लोग सूरज के उजालों को।

न पहले से रहे रिश्ते, न पहले सा है अपनापन,

हवा शहरी लगी जब से हमारे गाँव वालों को।

किसी से ज़िंदगी की मुश्किलें तुम पूछते क्या हो,

ज़रा देखो उधर दीवार पर मकड़ी के जालों को।

अरे, अब मछलियों की ख़ैर की तुम बात मत करना,

किसी ने बेच डाला यार नदियों और तालों को।

बिछाएँगे यही पहले तुम्हारी राह में काँटे,

यही फिर लाएँगे मरहम 'ज़िया' पाँवों के छालों को।​


— सुभाष पाठक 'ज़िया'

शिक्षक, 

ग्राम व पोस्ट समोहा, तहसील करेरा, ज़िला शिवपुरी मध्यप्रदेश - 473660

प्रकाशन- 1.शेरी मजमुआ ' दिल धड़कता है' (मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी भोपाल से उर्दू में 2020 में प्रकाशित) 

2.‘तुम्हीं से ज़िया है’ ग़ज़ल संग्रह 2022 पुरस्कृत

3.'हम लिखें ज़िंदगी ज़िंदगी' ग़ज़ल संग्रह 2023 पुरस्कृत

4. 'सभी मौसम हैं तुझमें ज़िंदगी' गीत संग्रह 2024


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