रात भर जागती हैं - खुशी कुमारी


ये आँखें तो रात भर जागती हैं,
अपने होने की वजह माँगती हैं।
सोती हैं तब भी, जागती हैं तब भी,
अपने वजूद की पहचान माँगती हैं।
ये आँखें तो रात भर जागती हैं,
देखती हैं सपनों को, उनमें हक़ीक़त के
ख़्वाब बुनती हैं।
खुली रहें तब भी, ढकी रहें तब भी,
अपने सपनों का एक
खूबसूरत-सा जहाँ माँगती हैं।
ये आँखें तो रात भर जागती हैं,
बिना कुछ कहे पूछती हैं मुझसे,
निगाहों से अपनी हर बात में
अपने होने की तलाश ढूँढती हैं,
अपने जीवन का लक्ष्य माँगती हैं।

—खुशी कुमारी
शोधार्थी, पीपीयू
पटना , बिहार 

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका