मत जला दूसरों का घर,
तेरा घर भी बगल में है।
आग फूँकना जिनका पेशा,
वो तेरे ही दल में है।
भिंडरावाला जिसने बनाया,
उनको कैसी सौगात मिली।
लादेन को शह देने वाले को,
देखा कैसी मात मिली।
भस्मासुर वरदानी शंभू,
किस तरह पड़े मुसीबत में।
जाना पड़ा शरण विष्णु की,
वो भी पड़े ग़नीमत में।
तुम हो किस खेत की मूली,
सोचा कभी भी ध्यान से।
बबूल रोपने वाला कभी भी,
खाता फल अरमान से?
सुनता होगा लोगों से अक्सर,
दूसरों हेतु काँटा मत बोना।
चुभेगा काँटा तुम्हीं को एक दिन,
उस वक़्त तुम मत रोना।
जैसी करनी वैसी भरनी,
सदियों से होता आया है।
नहीं मिटा सकता कोई भी,
प्रकृति ने इसे बनाया है।
प्रकृति की असीम शक्ति है,
वही न्याय का मालिक है।
उनसे कोई नहीं बच सकता,
उनके दूसरे हाथ में कालिख है।
- राम किशोर सिंह 'चकवा'
सचिव — काव्य संगम, सीतामढ़ी
सह सचिव — बिहार राज्य बज्जिका विकास परिषद्, सीतामढ़ी
अध्यक्ष — बज्जिका संयुक्त संघर्ष समिति, जिला शाखा सीतामढ़ी
Tags
कविता