स्याही की खुशबू (कहानी) — सन्दीप तोमर


 

स्कूली हिसाब से तो यह शायद छठी कक्षा रही होगी, लेकिन मेरी अपनी स्कूलिंग की गिनती में यह दूसरी या तीसरी कक्षा से ज्यादा नहीं थी। उम्र छोटी थी, मगर कुछ चीजों के प्रति मोह बहुत गहरा था। उन दिनों निब वाले पेन का जमाना था। आज की तरह दस रुपये में दस पेन खरीदकर फेंक देने वाली आदत नहीं थी। एक-एक पेन अपने भीतर एक कहानी रखता था।

मुझे पेन का बहुत शौक था।

बड़े भाई जब भी बाजार जाते, मेरी निगाहें उनके हाथों पर रहतीं। कपड़े, खिलौने या मिठाई से ज्यादा उत्सुकता इस बात की होती कि आज वे मेरे लिए कौन-सा पेन लेकर आए हैं। उन दिनों पेन भी कितने खूबसूरत हुआ करते थे। कोई पारदर्शी बॉडी वाला, जिसके अंदर नीली स्याही तैरती दिखाई देती थी, कोई रंग-बिरंगे डिजाइन वाला। एक पेन तो भैया चीन से लाए थे। मेड इन चाइना लिखा था उस पर, मगर मेरे लिए वह किसी विदेशी खजाने से कम नहीं था।

उसकी निब बड़ी नफासत से कागज पर चलती थी। अक्षर जैसे अपने आप सुंदर हो जाते थे।

मेरे बैग में हमेशा कई तरह के पेन रहते। ब्लूब्लैक स्याही की तो बात ही अलग थी। चैलपार्क की ब्लूब्लैक इंक भरते समय लगता जैसे कोई खास काम कर रहे हों। कुछ पेन ऐसे होते थे जिन्हें पीछे से खोलकर पिचकारी की तरह स्याही भरी जाती थी। कुछ फाउंटेन पेन में पीछे छोटी-सी रबर लगी होती थी, जिसे दबाकर स्याही अंदर खींची जाती थी। उस पूरी प्रक्रिया में ही एक आनंद था।

पेन लिखने का साधन नहीं था, वह एक साथी था।

शायद इसी लगाव के कारण मैं अपने पेन संभालकर रखता था। हर पेन का अपना स्थान था। कोई पेन खराब भी हो जाता तो मैं उसे फेंकता नहीं था। लगता था जैसे किसी पुराने दोस्त को घर से निकाल रहा हूँ।

इसी पेन प्रेम के दिनों में मेरी मुलाकात हुई थी सुलेमान से।

वह उम्र में मुझसे थोड़ा बड़ा था। पता नहीं क्यों, लेकिन वह अक्सर मेरी मदद किया करता। मेरा बैग कक्षा तक पहुँचना, छुट्टी के बाद उसे सड़क तक लाना, कभी-कभी घर तक छोड़ आना—उसकी आदतों में एक अपनापन था। मैं भी उसे अपना दोस्त मानता था।

लेकिन एक दिन उसने ऐसा काम कर दिया जिसकी कल्पना मुझे कभी नहीं थी।

भैया के कुछ कीमती पेन अचानक गायब हो गए।

भैया ने मुझसे पूछा- "कहाँ गए मेरे सारे पेन?"

मैंने मासूमियत से कहा- "मुझे नहीं पता।"

उनका शक मुझ पर ही गया। "किसी को दे दिए होंगे। पता है कितने महँगे थे?"

मैं चुप रहा। मन में पेन खोने का दुख ज्यादा था या भैया की डांट का डर, समझ नहीं आया।

कुछ दिन बाद मेरी नजर सुलेमान के ज्योमेट्री बॉक्स पर पड़ी। उसके अंदर वही पेन रखे थे। वही रंग, वही डिजाइन, वही निब।

मैंने धीरे से पूछा- "ये पेन तुम्हारे पास कैसे आए?"

वह बोला- "मेरे हैं।"

मैंने कहा- "नहीं, ये मेरे भैया के हैं।"

वह फिर भी मना करता रहा। लेकिन एक बच्चे की नजरें झूठ जल्दी पकड़ लेती हैं।

मुझे एक और बात पता चली। उसने उन पेन की कैप तक कहीं फेंक दी थीं। शायद उसे लगा होगा कि कैप बदल देने से पेन उसके हो जाएंगे।

मैंने उसे बहाने से घर बुलाया।

भैया ने जब सामने बैठाकर पूछा तो थोड़ी देर तक वह चुप रहा। फिर उसकी आंखें झुक गईं। सच बाहर आ गया। उस दिन भैया ने उसे डाँटा जरूर, लेकिन मुझे आज तक याद है—उससे ज्यादा दुख मुझे इस बात का था कि मेरे दोस्त ने मेरे पेन चुराए थे। शायद क्योंकि मेरे लिए वे पेन सिर्फ पेन नहीं थे।

समय गुजर गया।

अब भी मुझे पेन पसंद हैं। फर्क इतना है कि अब बाजार में वे पुराने निब वाले पेन बहुत कम दिखाई देते हैं। रिफिल भी मुश्किल से मिलते हैं। आजकल यूज एंड थ्रो पेन का जमाना है।

मुझे ये आदत कभी अच्छी नहीं लगी। पेन को इस्तेमाल करो और फेंक दो, यह विचार ही मुझे अजीब लगता है। मेरी अलमारी में आज भी कई पुराने पेन पड़े हैं। कुछ चलते हैं, कुछ नहीं चलते। लेकिन उन्हें देखकर लगता है जैसे किसी पुराने समय को संभालकर रखा हो।

हाँ, एक बात और है। मुझे खुद पेन खरीदना उतना पसंद नहीं जितना किसी का दिया हुआ पेन। गिफ्ट में मिला पेन अपने अंदर देने वाले का स्नेह भी रखता है।

हाँ, चोरी का पेन नहीं चाहिए।

आजकल चोरी के बड़े-बड़े किस्से सुनाई देते हैं। मैं तो बस इतना कहता हूँ- सलीके से एक पेन गिफ्ट कर दीजिए, वरना बचपन का साथी भेजकर चुरवा लेंगे। यह कहते हुए हँसी आ जाती है, लेकिन सच यह है कि वह साथी अब कहीं पीछे छूट गया है।

गाँव जाना लगभग छूट ही गया था। कभी-कभार जाना भी होता तो लगता जैसे किसी पुराने एलबम के पन्ने पलट रहा हूँ, जिन पर समय की धूल जम चुकी है।

वह झुरमुट नहीं रहे जहाँ छिपकर आँख-मिचौली खेलते थे। वे पेड़ नहीं रहे जिन पर चढ़कर न जाने कितने खेल खेले थे। जाने कितने खेल थे जिनके नाम तक अब याद नहीं।

लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें समय मिटा नहीं पाता।

उन्हीं गलियों से गुजरते हुए एक दिन अचानक आवाज़ आई- "अरे... तू?"

मैंने पलटकर देखा। कुछ पल के लिए पहचानने में वक्त लगा। फिर चेहरे की पुरानी लकीरों में बचपन की वही शरारत नजर आई।

"सुलेमान!"

वह जोर से हंसा- "इतने साल बाद भी नाम याद है?"

मैं मुस्कुरा दिया।

बातों-बातों में पता चला कि सुलेमान अब इलाके का बड़ा आदमी बन चुका था। एक राजनीतिक पार्टी में क्षेत्रीय अध्यक्ष था। लोग उसके साथ फोटो खिंचवा रहे थे, कोई अपनी समस्या बता रहा था, कोई सलाह ले रहा था।

मैं सोचने लगा- यह वही सुलेमान है, जो कभी मेरा बैग उठाकर स्कूल तक ले जाता था आज इतने लोगों की उम्मीदें उठा रहा है।

वह मुझे पास की एक छोटी-सी चाय की टपरी पर ले गया। कुल्हड़ में चाय आई। मिट्टी की खुशबू ने जैसे बरसों पुराना कोई दरवाजा खोल दिया।

हम पुराने दिनों की बातें करने लगे। स्कूल, मैदान, गलियाँ, शरारतें...

फिर अचानक मुझे पेन याद आ गए।

मैं हंसते हुए बोला- "एक बात बता, मेरे भैया के पेन याद हैं?"

सुलेमान पहले कुछ पल चुप रहा। फिर जोर से हंस पड़ा- "तू अभी तक नहीं भूला?"

मैंने कहा- "कैसे भूलता? इतने अच्छे पेन थे और फिर चुराने वाला भी अपना खास दोस्त।"

वह चाय की चुस्की लेते हुए बोला- "सच बताऊँ, उस समय मुझे पेन का लालच नहीं था। मुझे तो बस लगता था कि तेरे पास हर चीज मुझसे अच्छी क्यों है।"

मैं चुपचाप सुनता रहा।

वह आगे बोला- "तेरे पेन देखकर लगता था कि मेरे पास भी वैसे ही होने चाहिए। बचपना था। समझ नहीं थी कि चीज लेने और चुराने में फर्क होता है।"

कुछ देर वह खामोश रहा, फिर मुस्कुराकर बोला- "और सबसे बड़ी बेवकूफी तो ये की थी कि कैप फेंक दी थी। लगा था कि कोई पहचान नहीं पाएगा।"

हम दोनों हंस पड़े। फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा- "जानता है, उस दिन तेरे भैया ने मुझे जितना डाँटा था, उससे ज्यादा तेरी खामोशी ने शर्मिंदा किया था। तू चाहता तो मेरी शिकायत कर सकता था। लेकिन तूने मुझे चोर नहीं समझा, दोस्त समझा।"

उसकी यह बात सुनकर मैं कुछ देर कुछ नहीं बोल पाया।

कितनी अजीब बात है- बचपन की एक छोटी-सी चोरी, जो उस वक्त बहुत बड़ी लग रही थी, आज एक पूरी जिंदगी के बाद सिर्फ एक मुस्कान बनकर रह गई थी।

मैंने कहा- "अब तो बड़े नेता-सेता बन गए हो।"

वह हंस पड़ा।

"बड़ा नेता बनकर भी बड़ा आदमी तो नहीं बन पाया, लेकिन इतना जरूर समझ गया कि किसी का भरोसा चोरी नहीं करना चाहिए।"

चाय खत्म हो चुकी थी। हम दोनों उठे।

रास्ते में चलते हुए मुझे लगा गाँव की बहुत-सी चीजें बदल गई हैं। घर बदल गए, गलियाँ बदल गईं, लोग बदल गए। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी स्याही समय के साथ हल्की जरूर पड़ती है, मिटती नहीं।

जैसे बचपन का वह पेन... जो कभी किसी के हाथ में चोरी से गया था, लेकिन आज वही एक दोस्ती की सबसे पुरानी निशानी बनकर लौट आया था।


— सन्दीप तोमर

सम्पर्क: D 2/1,  जीवन पार्क, 
उत्तम नगर नई दिल्ली 110059

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