ढोलक की थाप, पैरों में बँधे घुँगरुओं की
छन-छन और
चटाक-चटाक होती करतल-ध्वनियाँ,
न जाने
कितने ही प्रश्न खड़े करती हैं
समाज की इस संवेदनहीन विद्रूपता पर।
हवा, आग, पानी और
धरती पर बराबर का हक़ होने के बावजूद,
धुँध-कोहरा और अँधेरा क्यों लिख दिया जाता है
इनके हिस्से?
इनके हिस्से के चाँद-सितारे छीनकर!
क्यों मुट्ठी भर छाँव से भी वंचित कर दिए जाते हैं ये
अभागे?
शारीरिक अपूर्णता का यह निर्दयी उपहास और
सदी की
दुर्दांत विडंबना तथा पंगु समाज की
अपंग सोच की इंतहा है यह।
आखिर यह विकृति
कब तक रौंदती रहेगी ये अभागी ज़िंदगियाँ,
और मनुष्य
मनुष्य होने का झूठा दंभ भरता रहेगा,
अपने एक हिस्से को
खुद से अलग-थलग करके आखिर कब तक?
दुनिया वालों! इन्हें भी उसी तरह अपना लो, जैसे
बेटे या बेटी को
अपना लेते हो तुम कलेजे का टुकड़ा कहकर।
इन्हें भी इनके हिस्से की
आँचल भर छाँव दे दो, ताकि ये भी जी सकें
सिर उठाकर
इस बेरहम दुनिया में, और बचे रहें
यतीम होने से माँ-बाप के होते हुए भी।
— अशोक 'दर्द'
डलहौजी, चंबा
हिमाचल प्रदेश