प्यार का यही सिला,
प्रेम-देवता मिला।
हार-जीत में पड़े,
आदमी यहाँ लड़े।
दुःख में कभी नहीं,
आज थे खड़े वहीं।
नूर तो रहा नहीं,
ताज तो रहा यहीं।
वासना भरा हुआ,
खेलता रहा जुआ।
सोच आदमी रहा,
दर्द है यहाँ सहा।
प्रेम जो कहीं नहीं,
माँग क्यों रहा यहीं?
ज़िंदगी! बता अभी,
जंग हार के सभी।
जोड़ हाथ माँगता,
प्रेम-अर्थ बाँटता।
सूर्य-तेज खो गया,
अंत सृष्टि हो नया।
— सूरज तिवारी
भदोही, उत्तर प्रदेश