कब जागेगा देश हमारा? (कविता) - आचार्य अर्चना चौधरी 'अर्पण'

नारी नर का ग्रास बन रही,
दैत्यों के आहार बन रही।
रोज़-रोज़ संताप सह रही,
चांडालों का त्रास सह रही। (स की जगह सह)
कब काली हुंकार भरेगी?
दैत्यों का संहार करेगी। (के की जगह का)
कब तक अस्मत लुटा करेगी,
ललनाओं की बीच सड़क पर? (का की जगह की)
कब तक जीवन देगी बेटी,
पापों के दुष्चक्र-पटल पर? (योजक चिह्न)
होगा कब इसका निबटारा,
कब जागेगा देश हमारा?
निर्ममता की भेंट चढ़ेगी,
कब तक बेचारी यूँ ही मरेगी? (बहाना की जगह बेचारी)
बचा जगत में क्या अब बाकी?
आँखें खोलो हे वैरागी! (है की जगह हे)
पाप-मुक्त संसार करो अब,
कर तांडव या प्रलय करो अब।


— आचार्य अर्चना चौधरी 'अर्पण'
          समस्तीपुर, बिहार 


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