रुख़ से ज़ुल्फ़ें हटाओ कि दीदार हो
माज़ी की बातों का फिर से इज़हार हो
एक नज़र की ही ख़ैरात कर दो सनम
ज़िंदगी की हर इक राह हमवार हो
दिल की वीरानियों को आ जाए क़रार
तेरा दामन ये ख़ुशबू का अंबार हो
चाँदनी रात है आज पागल बहुत
तेरे इस हुस्न का रंग गुलनार हो
'नज़्म' तुमने तो नश्तर कई सह लिए
सच तो यह है कि तुम एक फ़नकार हो
— नज़मुल्लाह 'नज़्म'
कवि , शिक्षक