छोड़के घर, शहर को आज मैं जाऊँ कैसे! (ग़ज़ल) - सूरज तिवारी

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बाप की हर एक विरासत को बढ़ाऊँ कैसे,

छोड़के घर, शहर को आज मैं जाऊँ कैसे!


​ख़ाक होते हुए देखा, जो कभी ज़िंदा-दिल था,

शख़्स जो शेर था, उसको यूँ जगाऊँ कैसे!


​जब अदालत में बिके न्याय खुलेआम यहाँ,

फिर मैं क़ातिल को सज़ा आज दिलाऊँ कैसे!


​ख़ौफ़ बेतरह बढ़ा तीरगी का अब देखो,

एक ही दीप मैं हर रोज़ जलाऊँ कैसे!


​झूठ करता है जो बे-आब हमेशा सच को,

रूह में आग लगी है, यह बुझाऊँ कैसे!

​— सूरज तिवारी

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