बाप की हर एक विरासत को बढ़ाऊँ कैसे,
छोड़के घर, शहर को आज मैं जाऊँ कैसे!
ख़ाक होते हुए देखा, जो कभी ज़िंदा-दिल था,
शख़्स जो शेर था, उसको यूँ जगाऊँ कैसे!
जब अदालत में बिके न्याय खुलेआम यहाँ,
फिर मैं क़ातिल को सज़ा आज दिलाऊँ कैसे!
ख़ौफ़ बेतरह बढ़ा तीरगी का अब देखो,
एक ही दीप मैं हर रोज़ जलाऊँ कैसे!
झूठ करता है जो बे-आब हमेशा सच को,
रूह में आग लगी है, यह बुझाऊँ कैसे!
— सूरज तिवारी