वो शमा, वो उड़ते परवाने बस्ती से,
चले गए सब यार पुराने बस्ती से।
सब बहकावे में हैं आकर रूठ गए,
फूलों के मंज़र सुहाने बस्ती से।
प्यार, मोहब्बत और सौहार्द की ख़ानें,
कौन ले गया लूट ख़ज़ाने बस्ती से!
नफ़रत की आंधी के उठते ही सारे,
छुप गए अपने और बेगाने बस्ती से।
प्यार की पींगें और शोहरत की रिमझिम,
चले गए मौसम सुहाने बस्ती से।
अपनी जो तहज़ीब थी मिलकर रहने की,
कौन ले गया लूट, न जाने, बस्ती से!
इक दिन दुनिया वालो, हम बंजारे भी,
चले जाएँगे छोड़ ठिकाने बस्ती से।
— अशोक 'दर्द'