लोहे का एक विशाल आकृतिकाय,
और भीतर बैठा मैं—शांत, निरुद्देश्य, अभय।
पहियों की धक-धक में तेरा स्पंदन था,
खिड़की के पार छूटता हर दृश्य, मेरा ही कोई बंधन था!
तू दौड़ती रही पटरियों की ज़ंजीरों पर,
जैसे उकेरी गई हो नियति की लकीरों पर।
मैंने पूछा—
"थकती नहीं इस निरंतर भार से?
अगणित सपनों, शिकायतों और इस बिखरे संसार से?"
तूने एक ठंडी आह भरी, जब एक स्टेशन आया;
ब्रेक की चीख़ में तेरा छिपा हुआ दर्द छलक आया।
भीड़ का हुजूम उमड़ा, धक्का-मुक्की सी मच गई,
आने-जाने की होड़ में तेरी साँसें घुटने लगीं।
जब स्टेशन पर तू थोड़ी देर को सुस्ताती है,
मुसाफ़िर उतरते हैं, और तू थोड़ा हल्का महसूस कर पाती है।
कोई चाय की दुकान पर भागा, कोई समोसे-पानी में खोया;
तेरी देह पर पड़ा वो भारी बोझ, पल भर को जैसे सोया।
पर राहत की यह घड़ी भी कितनी मुख़्तसर होती है,
तभी दूर पटरियों पर हरे सिग्नल की रोशनी होती है!
तू एक लंबी, तीखी सीटी बजाकर सबको पुकारती है;
जैसे जगाती हो सोए हुओं को, और हौसले से पुकारती है—
"आ जाओ मुसाफ़िरों, अभी मंज़िल दूर है!
छोड़ो आलस, चलो! सफ़र अभी बाक़ी है।"
फिर वही अफ़रा-तफ़री, वही चढ़ने की होड़,
और फिर छोड़ जाते वे अपने गैर-ज़िम्मेदार निशान—
मूंगफली के छिलके, खाली बोतलें और गंदगी का सामान!
मैंने सहलाया तेरी लोहे की दीवार को चुपचाप,
महसूस किया तेरा अंदर ही अंदर जलता हुआ संताप।
तूने धीरे से मेरे मौन के कानों में कहा—
"देख मानव! जिस छाँव में बैठा, उसी को मैला कर चला।
मुझे दर्द लोहे की काया पर ज़ख़्मों का नहीं होता,
दर्द तो तब है जब इंसान अपनी ही मर्यादा खोता!
मैं तो सबको लेकर बिना भेदभाव के चलती हूँ,
फिर भी हर मुसाफ़िर के अशिष्ट आचरण से जलती हूँ।"
मैंने कहा—
"हे हमसफ़र! यह दुनिया बड़ी अजीब है;
स्वार्थ में डूबी है, फिर भी तेरे कितने क़रीब है!
तू सहती है सब कुछ, माँ की तरह बिना कहे,
ताकि किसी राहगीर का रास्ता अधूरा न रहे।"
इसी बातचीत के बीच जब मैंने डिब्बे में नज़र दौड़ाई,
एक ही छत के नीचे जीवन की अजब विविधता नज़र आई!
कोने की सीट पर बैठा वो वृद्ध, उदासी में डूबा था;
अपनों के दिए ज़ख़्मों से उसका हृदय जैसे टूटा था।
तो दूसरी ओर एक नया जोड़ा, खुशियों के दीप जला रहा था;
आँखों ही आँखों में जीवन की नई शुरुआत सजा रहा था!
कोई शहर में अपनी कमाई लुटाकर लौट रहा था खाली हाथ,
कोई पहली नौकरी की उम्मीद थामे हँस रहा था दोस्तों के साथ।
तंग गलियारे में बार-बार एक ही दृश्य दोहराता है,
जहाँ हर मुसाफ़िर खुद को बचाकर राह बनाता है।
सबसे पहले—"ठंडा पानी! पानी!"—चिल्लाता वो लड़का आया,
ज़रा-सा सरककर भीड़ ने उसे निकलने का रास्ता दिया।
फिर—"गरम चाय! चाय!"—की पुकार से सन्नाटा टूटा,
कुल्हड़ की महक से सोए हुए राही का ध्यान छूटा।
पीछे-पीछे—"गरम मूंगफली!"—की आवाज़ गूँज उठी हवा में,
और फिर काले कोट में टी.टी. आया, अपनी रोबदार अदा में!
टिकट दिखाते हाथ, और डर से काँपती हुई आँखें,
टी.टी. की सख्त नज़रें जैसे हर कागज़ को जाँचें।
तंगी ऐसी कि कोई बर्थ पर ऊपर सोकर सपना बुनता,
तो कोई नीचे फ़र्श पर चादर बिछाकर रात काटता।
कोई शौचालय की चौखट पर बैठा हिम्मत समेट रहा,
तो कोई खुले दरवाज़े पर खड़ा, हवा के झोंकों को लपेट रहा!
एक युवक आँखें मूँदे, अपने टूटे हुए सपनों को छोड़ आया,
पर पास बैठा एक बालक, कोरी डायरी पर नया कल सजा रहा था।
तूने फिर सीटी बजाई, और अपनी रफ़्तार बढ़ाई,
जैसे हर सुख-दुख को समेटकर आगे बढ़ने की सीख दी आई!
तू रुकी नहीं, न मैं ही ठहरा अपने भीतर;
हम दोनों चलते रहे—एक बाहर, एक भीतर!
तू मंज़िल की ओर भागती एक सहिष्णु काया थी,
और मैं तेरे इस मौन दर्द और इस बहते संसार को शब्द देता एक साया था।
जब अगला स्टेशन आया और तू फिर से थमी,
तेरे लोहे के जिस्म पर राहों की धूल और ज़ख़्मों की नमी।
मैं उतरा, पर समझ आया कि हम अलग कहाँ थे—
तू ज़ख़्म और दुनिया के सारे रंग सहकर भी चलती रेल थी,
मैं शब्दों में जलता एक कारवाँ था!
- सुशील कुमार
सीतामढ़ी, बिहार