बेरोजगारों की बलि (लघुकथा) - सेवा सदन प्रसाद

रात का तीसरा पहर। कुछ लोग बड़ी बेसब्री से एक विशेष विमान का इंतज़ार कर रहे थे। उनमें कुछ सरकारी अधिकारी और कुछ पुलिस महकमे के पदाधिकारी भी मौजूद थे।  

तभी एयरपोर्ट पर शोर सुनाई पड़ा। किसी राजनीतिक दल के कुछ कार्यकर्ता एवं कुछ पीड़ित परिवार सरकार-विरोधी नारे लगाते हुए पहुँचे। आनन-फ़ानन में मीडिया भी पहुँच गया। तभी एक छोटा-सा विमान लैंड हुआ। पुलिसवालों ने विमान को घेर लिया। विमान से कुछ ताबूत उतारे गए। तुरंत एम्बुलेंस आ गई और उन ताबूतों को लोड करके चल पड़ी। उन्हीं में बिश्वेसर सिंह का भी पार्थिव शरीर था।  

तभी व्हीलचेयर पर बैठी बिश्वेसर की अम्मा चिल्ला पड़ीं— "बेटा! तू तो विदेश में मजदूरी करने गया था। बहुत ही गर्व से संदेश भेजा था कि रूस पहुँच गया.... यहाँ बहुत अच्छी मजदूरी मिलती है और भरपूर सुविधा भी। पर वहाँ तुझे सैनिक किसने बनाया? अब तेरे परिवार का क्या होगा? बच्चों की परवरिश कौन करेगा?"  
मीडियावाले और करीब आ गए। तब वृद्ध चीख पड़ीं— "सरकार इन्हें शहीद का दर्जा दे और परिवार को संरक्षण।"  


- सेवा सदन प्रसाद
    मुंबई, महाराष्ट्र 

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