लकीर के जो फ़क़ीर हैं...।
खुद को समझें कबीर हैं...।
क़िस्मत इनकी गर्दिश में,
फ़ाके करे तक़दीर है...।
जिनकी उजली क़मीज़ तले,
मैले-गंदे ज़मीर हैं...।
दीमक-लगा बददिमाग़ है,
पिटे-से देते नज़ीर हैं...।
दमड़ी नहीं एक जेब में,
समझते आलमीगीर हैं...।
असल के चना-चोर वो,
बनना उनको वज़ीर है...।
दौड़ने घोड़ा काठ का,
देखो कितना अधीर है...।
— ममता तिवारी 'मृदुला'