अपलम चपलम (हास्य - व्यंग्य कविता) - ममता तिवारी 'मृदुला '

लकीर के जो फ़क़ीर हैं...।
खुद को समझें कबीर हैं...।

क़िस्मत इनकी गर्दिश में,
फ़ाके करे तक़दीर है...।

जिनकी उजली क़मीज़ तले,
मैले-गंदे ज़मीर हैं...।

दीमक-लगा बददिमाग़ है,
पिटे-से देते नज़ीर हैं...।

दमड़ी नहीं एक जेब में,
समझते आलमीगीर हैं...।

असल के चना-चोर वो,
बनना उनको वज़ीर है...।

दौड़ने घोड़ा काठ का,
देखो कितना अधीर है...।


— ममता तिवारी 'मृदुला'


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका