आख़िरी सत्य (कविता) - त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय


​सच बोलूँ, शायद झूठा बनकर रह जाऊँ,

किंतु सत्य क्या है? शायद यह कह न पाऊँ।

​सत्य कठिन है जितना कहना, उतना सुनना,

सत्य बोलने आज चला हूँ, रुककर चुनना।

​सत्य अगर सुनना है, चलो, नहाकर आओ,

नये-नये कपड़े धारण कर, बैठ भी जाओ।

​और तसल्ली कर लो, कोई कुछ न बोले,

ध्यान-साधना की मुद्रा में बैठ, टटोले।

​कहने को अब सत्य यहाँ तैयार खड़ा हूँ,

बस समझो, इस पार है तू, उस पार खड़ा हूँ।

​एक परत है बची, एक झिल्ली है, परदा,

उठा, सत्य आ गया, झाड़ लो सारा गर्दा।

​नथुना मत ऊपर-नीचे कर, रोष दिखा ना,

अहं त्याग कर, हो समर्पित, धीरे आना।

​तेरे ही कारण मैं पर्दा उठा रहा हूँ,

देख सत्य धारण किए मैं आ रहा हूँ।

​तुझे क्या लगता, सत्य बताना बहुत सरल है?

अरे! सत्य सुनना भी तो यह बहुत गरल है।

​सत्य, अगर कहना है मुश्किल, है भी सुनना,

और कठिन है राह सत्य की जाकर चुनना।

​मगर धैर्य की भी सीमा होती है, भाई!

मैं मानव हूँ प्रथम, नहीं मैं कोई कसाई।

बहुत हो गयी अब तो, मजबूर हो चला,

सत्य छुपा है मात्र सुशोभित अक्षर ढाई।

​राम, सत्य है नहीं कहूँ, श्री कृष्ण सत्य है,

जितने भी हैं धर्म धरा पर, सब असत्य है।

​सत्य वही है जो अंतः से स्फुटित हो रहा,

दुःख को देख तुम्हारा यह मन व्यथित हो रहा।

​सत्य यही है—भूखे को जल और वस्त्र दो,

सत्य वही है—ठिठुर रहा जो, उसे कंबल दो।

​मूक-बधिर को दो बोली, मन को न मारो,

विजयी होकर आया जो, आरती उतारो।

​फ़िर भी सत्य नहीं कह पाया, खेद है।

साफ़ समझ में आया, कंतरा छेद है।


- त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय 



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