त्योहारों का अनुपम देश (कविता) - चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

त्योहारों का अनुपम देश हमारा,
पर्वोत्सव है इसकी प्रति-छाया।
त्योहार—आस्था, व पर्व—उपासना,
उत्सव होते मनोरंजन की माया।।

आस्था, उपासना हैं संयुत होकर,
करते हिय-जिय व निर्मल काया।
मानव-उत्कंठा का प्रेरक सुविचार,
त्योहार, पर्वोत्सव रूप में आया।।

मनोरंजन में भी जो 'उत्सव' लाया,
'उत्सव-प्रिय' यह मानव कहलाया।
महिमा और गरिमा से अपनाकर,
कला और संस्कृति को पनपाया।।

ऋतु-आश्रित है मानव-तन काया,
षड्-ऋतुओं के ही अनुकूल बनाया।
हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् है—
स्वास्थ्य-हितैषी, जग को समझाया।।

है त्योहारों का यह प्रिय देश हमारा,
जो आदर्श-निदर्श से जग को भाया।
त्योहारों में भी वैदिक-दर्शन छाया,
ऋषि-मुनियों ने इसको ख़ूब सजाया।।

आओ हम मिलकर त्योहार मनाएँ,
पावन तन-मन से, आकंठ अपनाएँ।
भारतीय संस्कृति व जीवन-शैली को,
वसुधा पर हम, हर दिशि में फैलाएँ।।


— चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"
चलभाष: 9305988252

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