जहाँ-जहाँ रावण होगा (छंदमुक्त) - ममता तिवारी मृदुला

जहाँ-जहाँ रावण होगा,
वहाँ-वहाँ रण होगा!
तब रावण एक था,
राम करोड़ थे।
आज...
आज मुसलसल बढ़ रहे हैं—
चंड-मुंड, रुंड-मुंड!
उसे छीनने की आदत थी,
इन्हें भी...
चोरी धर्म, मुँहज़ोरी कर्म था,
इनका भी...
वह सबको रुदन कराता था,
मानवता के नियमों को
ठेंगा दिखाता था...
ये लोग भी!
रावण यानी रुलाने वाला,
धरती को दहलाने वाला...
बिल्कुल वैसा ही!
रावण-प्रवृत्ति खा जाएगी सबका हक़?
निगल जाएगी धरती?
नहीं, हरगिज़ नहीं!
राम एक हैं, पर...
उनके पास करोड़ बाण हैं!
शायद देख रहे हैं गुंजाइश—
रावणों में सुधार की...


— ममता तिवारी मृदुला 

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