अलगाओ (बज्जिका लघुकथा) - डॉ. विद्या चौधरी

         "रीता, तोरा बिआह करे के मन नs करइत हऊ?"
         "केकरा से बिआह करू मोनी!"
         "कइसन बात करइत हते! कोनो लरिके न तोरा देखाई देइत हऊ, जेकरा तूँ......?"
         "देखाई तs देइत हए ......।"
         " तs फेर.....?"
         "सखी ! हम लरीके में माय - बाबूजी के अल्लग होइत देखले हती। ऊ दुन्नों गोटा के अल्लग होइत देखनाई असान न रहे, बाकि देखली।"
         "आरे, ऊ ओ लोग के जीवन रहई, तूँ अप्पन देख न!"
         "सखी! इन्सान पर असानी से भरोसा करे में डर लगइत हए।"
              

- डॉ. विद्या चौधरी 
     पटना , बिहार 


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