भूख (छंदमुक्त) - अश्वनी अम्बुज

भूख उठी उस चाँद पर,
क्षण में उठी, फिर शांत हो गई।
भूख उठी उन सितारों पर,
तनिक झिलमिल आहट के साथ,
लो, फिर शांत हो गई!
भूख उतरी उस काले पहाड़ पर,
फिर नज़र से ओझल,
यानी शांत हो गई।
भूख उतरी उस बरगद पर,
निरीह-मासूम पौधे चीखने लगे,
लो, फिर शांत हो गई!
भूख उठी जल पर,
मगरमच्छ पर, समंदर में खलबली,
मछलियों को तड़पाकर शांत हो गई।
भूख उतरी मासूम चिड़िया पर,
धूप में पकी साँसों से रुकी,
दूर खेत में दाना-पानी ले शांत हो गई।
लेकिन भूख जब आई
उस नंगे के पेट पर,
जो कुत्तों से छीनकर लोगों का
बचा हुआ खाना खा रहा था—
लेकिन खा नहीं पाया;
तब मेरी क़लम जाग उठी,
अपनी संपूर्ण दूरदृष्टि-नेत्र खोलकर!
लेकिन भूख जब उठी
वहशी शेर पर,
जो सिंहासन पर महिमामंडित
विराजमान था;
मैंने देखा—
सत्य, करुणा, दया,
ईमानदारी, नैतिकता,
असहाय लाचारी,
ग़रीबी, बेरोज़गारी...
और तब मेरी
आँखें फटी की फटी रह गईं,
रूह काँप उठी,
जब वह निगलने लगा
धीरे-धीरे संपूर्ण तिरंगे को!
मेरे अंदर की ज़मीन खिसकने लगी...
भूख फिर शांत हो गई!


—  अश्वनी अम्बुज 
व्यंग्यकार, भोपाल, मध्य प्रदेश




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