आँख खुली तो मैंने स्वयं को
ढाबे की मेज़ पर पाया।
सबसे पहले ढाबे के मालिक ने मुझे
उलट-पलट कर देखा,
उसने मेरे अंग-अंग बेतरतीब कर दिए।
फिर न जाने कितने ग्राहकों ने
सुबह से शाम तक मुझे बरता,
और मैं शाम तक चिंदी-चिंदी हो गई थी।
मालिक घर जाने लगा तो नौकर ने
मुझे फाड़कर किसी सामान के बाहर लपेट दिया
और बोला— "आज की अख़बार ख़त्म समझो,
कल नई आ जाएगी।"
मैं अंदर ही अंदर कसमसाई,
फ़र्श पर बिखरे मेरे टुकड़े बोले—
"मैं मरी नहीं, ज़िंदा हूँ,
मेरे कई शब्द लोगों के ज़हन में उतर गए हैं।"
"मुझे भले ही एक दिन की उम्र मिली थी,
मैंने सबका मनोरंजन, ज्ञानवर्धन किया,
उनकी समस्याएँ उठाईं और समाधान दिया है;
फिर मैं मरी कैसे?
यह मेरा भ्रम नहीं, वास्तविकता है।"
इससे पहले कि मैं अपनी पीड़ा कुछ और कहती,
दूसरी सुबह आ गई।
मेरी सखी— दूसरी अख़बार मेज़ पर थी,
मालिक और ग्राहकों की सेवा के लिए;
और मैं टुकड़े-टुकड़े हुई देख रही थी—
यह सब नियति का खेल!
सच में,
उम्र एक दिन की हो या बरसों की,
यूँ ही अख़बार की तरह बीत जाती है।
— अशोक 'दर्द'